‘पियासल प्रेम’मे अहुड़िया कटैत ‘नैतिक-अनैतिक’ विमर्श गाथा

डॉ. प्रकाश
आइए समाप्त भेल अछि श्री केशव भारद्वाज लिखित उपन्यास ‘पियासल प्रेम’ । ई संयोग जे ‘मलंगिया महोत्सव’मे एहि उपन्यासक लोकार्पणके समय हमहूँ मंच लग रही, तेँ लोकार्पित पुस्तक हमरो हाथ लागि गेल । ओना आदरणीय केशव भारद्वाज अत्यंत आत्मीय छथि, पोथी त’ भेटबाके छल । ओना उपन्यास पढ़ैत हमरा डर होइत अछि । हमर योजना किताबके एक्के सूरमे पढ़क रहैत अछि, तेँ हम उपन्यास स’ कतराइत रहैत छी । मुदा, ई त’ छल ‘पियासल प्रेम’… कोना नहि पियास बुझबितौं, तेँ पढ़ि गेलहुँ ।
श्री केशव भारद्वाज जीक एकटा हिंदी उपन्यास ‘मैं, मानिनी और प्रिया’ पढ़ने रही । ठीक ठाक लागल छल । एक त’ पुलिस अधिकारी ताहि पर आत्मीय आ सज्जन तखन साहित्य लेखन; वर्तमानमे एक ठाम भेटब कठिन अछि – तकर संगम छथि केशव भारद्वाज जी ।
उपन्यास शुरु कर’ स’ पहिने हम गलतीक’ गेलहुँ – पहिने ‘भूमिका’ आ ‘अप्पन बात’ पढ़ि लेलहुँ । भूमिका लिखने छथि भाई अजित आजाद, शीर्षक छै “मोनमे सुनगैत अतृप्त इच्छाक आँच” आ स्वयं लेखक उपन्यासक लेल अप्पन बात लिखिए देलन्हि अछि । हिनका दुनूक गप्प मोनमे पहिने स’ चलैत रहल ‘पियासल प्रेम’ पढ़ैत काल, से पाठकक नजरि स’ अनुचित भेल । तथापि, हम आदि स’ अंत कयल ई उपन्यास ।
उपन्यास एकटा युवक केतन’क जीवनक इम्हर-उम्हर घूमैत अछि, जाहिमे केतन’क माय-बाप, सर-संबंधी, गाम-घर, संगी-साथी, पोस्ट-पोस्टिंग, आस-पड़ोस, देश-विदेश, घर-परिवार, सुख-दुख, सबटा वर्णित छैक । ई कहबामे मिसियो अशोकर्ज नहि जे ई केतन के बहन्ने आम व्यक्तिक जीवनक गाथा थिक उपन्यास ‘पियासल प्रेम’ ।
‘पियासल प्रेम’क भूमिकाक अनुसारे हम उपन्यासक अंतिम पाँति धरि ‘प्रेम’ आ’ ‘पियास’ तकैत रहलहुँ, मुदा ने प्रेम भेटल आने पियासे । त’ की भेटल ? हमरा भेटल नैतिकता… अनैतिकता । ई उपन्यास मात्र अही दू शब्दक अक्ष पर नचैत अछि, जे वर्तमानमे अपन अमरलत्ती जेना सौंसे समाज पर चतरि रहल छैक ।
ई उपन्यास अपन कथानक आ पात्र सभक माध्यमसँ स्त्री-पुरुष संबंधक जटिलताकेँ प्रस्तुत करैत अछि । मुख्य पात्र केतन जीवनक विभिन्न स्थान, यथा – गाम, आस-पास आ कार्यालय सभमे अनेक स्त्री सभक प्रति आकर्षित होइत अछि । ओहिना जेना युवावस्थामे प्राय: सब होइत छथि । ओकर मोनमे स्त्री-सौंदर्य आ दैहिक आकर्षणक प्रति स्वाभाविक भाव उत्पन्न होइत छैक । दोसर दिस, उपन्यासक स्त्री सभ सेहो अपन इच्छा आ स्वेच्छासँ केतनक (वाकि केतन रूपी कोनो युवक भ’ सकैत अछि) निकट अबैत छथि । एहि संबंध सभमे कतहु दबाव, शोषण अथवा जबरदस्ती केर भाव नहि देखाइ पड़ैत छैक । पूर्णत: स्वाभाविक वा एना कहल जा सकैत अछि, जे विपरित लिंगक प्रति आकर्षण मात्र । सभ पात्र अपन-अपन सीमा आ मर्यादाक ध्यान रखैत जतेक तक संभव हुनका लगैत छन्हि, आगाँ बढ़ैत छथि । केतन केवल भावनात्मक अथवा दैहिक आकर्षणक पात्र नहि अछि, बल्कि ओ अपन सामाजिक आ पारिवारिक दायित्व सभकेँ सेहो गंभीरतापूर्वक निभबैत अछि । ओ अपन कार्यालयिक उत्तरदायित्व सभक प्रति सेहो सजग देखाइ पड़ैत अछि । एहि कारणसँ ओकर चरित्र केवल भोगवादी नहि लगैत छैक । उपन्यासमे बेर-बेर नैतिकता आ अनैतिकताक द्वंद उभरि क’ आगू अबैत अछि । केतन जखन कोनो स्त्रीक संपर्कमे अबैत अछि, तखन ओकर भीतर ई संघर्ष चलैत रहैत छैक, जे ओकर व्यवहार उचित अछि कि अनुचित । इएह मानसिक द्वंद एहि उपन्यासक मूल संवेदना बनि जाइत छैक । केशव जी मानवीय इच्छा आ सामाजिक मर्यादाक बीचक संघर्षकेँ प्रभावकारी ढंगसँ चित्रित केने छथि । प्रेम, आकर्षण आ नैतिक प्रश्न सभक ई मिश्रण उपन्यासकेँ गंभीर बना दैत छैक, नहि की प्रेम लेल पियासल ।
आजुक समयमे नैतिक आ अनैतिक संबंधक प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहि, बल्कि पारिवारिक आ सामाजिक चिन्ताक विषय बनि गेल अछि । स्त्री-पुरुष संबंधक मर्यादा समाजक रीढ़ मानल जाइत अछि । जखन संबंध स्वच्छ, विश्वास, सम्मान आ जिम्मेदारीस’ बढ़ैत अछि, तखन ओ नैतिक कहल जाइत छैक । ठीक एकर विपरीत अविश्वास, स्वार्थ, डर आ मर्यादा भंग करए बला संबंध अनैतिक कहाइत अछि । ई सम्बंध व्यक्तिगत स्तर पर सेहो आत्मसम्मान आ मानसिक शान्तिकेँ प्रभावित करैत छैक । स्त्री आ पुरुष दुनूक लेल संबंधमे समान सम्मान, निष्ठा आ संवेदनशीलता आवश्यक होइछ । तेँ प्रत्येक व्यक्तिकेँ अपन संबंध सभमे नैतिक मूल्य आ सामाजिक मर्यादाक पालन करबाक चाही, ताहि लक्ष्य दिस ई उपन्यास पाठककेँ ल’ जाइत छन्हि ।
स्वेच्छासँ बनाओल गेल स्त्री-पुरुष संबंधकेँ ‘नैतिक’ वा ‘अनैतिक’ स’ संज्ञापित करब ओकर परिस्थिति, सामाजिक मान्यता, जिम्मेदारी आ आपसी सम्मान पर निर्भर करैत छैक । जँ प्रेम आपसी सहमति, सम्मान, ईमानदारी आ सामाजिक-वैधानिक मर्यादाकेँ ध्यानमे रखैत हो, आ ताहिसँ ककरो व्यक्ति, परिवार अथवा समाजकेँ धोखा, शोषण वा हानि नहि पहुँचैत हो, तँ सामान्यतः ओकरा नैतिक मानल जाइत छैक । भारद्वाज जीक केतन अपन जीवन पथ पर सतत बढ़ैत कतेको संबंधस’ गुजरैत अछि आ सब संबंधके नैतिकता आ अनैतिकता के तराजू पर तौलैत रहैत अछि । तेँ ई उपन्यास मात्र पियासल प्रेम वा कि कामुक गाथा नहि रहि क’ नैतिक चिंतनक दतावेज बनि गेल अछि ।
उपन्यासमे कोनो-कोनो स्थानपर संवाद आवश्यकता सँ बेसी बोल्ड भ’ गेल अछि । कतेको प्रसंग एहन अछि जतय लेखक यदि संकेतात्मक आ शृंगारिक शैलीक सहारा लेने रहितथि, तँ भाव आरो प्रभावशाली बनि सकैत छल । प्रेम आ आकर्षणक अभिव्यक्ति साहित्यमे केवल स्पष्ट शब्द सभसँ नहि, बल्कि संवेदनात्मक भाषा, प्रतीक आ भावपूर्ण संकेत सभक माध्यमसँ सेहो होइत रहल अछि । एहि उपन्यासमे किछु संवाद अपन तीव्रताक कारण कथाक सौंदर्यात्मक गरिमाकेँ कने प्रभावित अवश्य करैत छैक । पृष्ठ 59 पर केतन आ नीताक संबोधन छनेमे बदलि जाइत छैक – ‘अहाँ’ स’ ‘तोरा’पर आबि जाइत छैक, सेहो कनी खटकतन्हि पाठककेँ ।
पूरा उपन्यास पढ़लाक बाद सबस’ बेसी अखड़ल हमरा एकर नाम ‘पियासल प्रेम’ राखब । कोनो किताबक वा कि आलेखक नामकरण वा शीर्षक देब सबस’ बेसी कठिन काज थिक । एहि पर गम्भीरता स’ सोच-विचार करक चाही ।
‘पियासल प्रेम’ शीर्षक जतय केवल प्रेम आ आकांक्षाक संकेत करैत अछि, ओतहि उपन्यासक कथाक वास्तविक केंद्र नैतिक-अनैतिक संबंधक विचार-विमर्श अछि । एहि दृष्टिसँ देखल जाए तऽ उपन्यासक नाम ‘नैतिक – अनैतिक’ बेसी सार्थक प्रतीत होइत अछि । ई शीर्षक कथाक मनोवैज्ञानिक आ सामाजिक पक्षकेँ बेसी स्पष्ट रूपसँ व्यक्त करितय, से हमरा लगैत अछि । उपन्यास पाठककेँ संबंध सभक नैतिक सीमापर विचार करबाक लेल प्रेरित करैत अछि । एकर स्वर छैक जे मनुष्यक जीवन केवल इच्छासँ नहि, बल्कि जिम्मेदारी आ मर्यादासँ सेहो संचालित होइत अछि । ओना बाजारबादके हिसाबे भ’ सकैत अछि जे वर्तमाने नाम उचित होई, मुदा केशव भारद्वाज बहुत गम्भीर उपन्यास लिखलाह अछि तेँ वर्तमान नाम उपन्यासक गम्भीरताके कमतर करैत अछि । अस्तु…
पुस्तक : पियासल प्रेम (उपन्यास)
लेखक : केशव भारद्वाज
पृष्ठ संख्या : 136; मूल्य : 250/-
प्रकाशक : नवारम्भ प्रकाशन; मधुबनी/पटना/दिल्ली.
(साभार : डॉ प्रकाश झा जी कें फेसबुक सं)

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