
नई दिल्ली। परिवार में संपत्ति के मुद्दा अक्सर झगड़ा के सबसे बड़ा कारण बनैत अछि। बहुत बेर देखल जाइत अछि जे पिता अपन पूरा संपत्ति एके बेटा के नाम क’ दैत छथि, जाहि से दोसर बेटा-बेटी में विवाद खड़ा भ’ जाइत अछि आ मामला कोर्ट तक पहुंचि जाइत अछि। एहन स्थिति में कानून की कहैत अछि, ई बुझनाय जरूरी अछि। सर्वोच्च न्यायालय अपन कई फैसला में ई साफ क’ चुकल अछि जे संपत्ति के प्रकार पर निर्भर करैत अछि जे पिता केतबा अधिकार राखैत छथि।
पैतृक संपत्ति पर सभक अधिकार
जदि संपत्ति पैतृक (पुरखा से भेटल) अछि, त’ पिता एकरा सिर्फ एक बेटा के नाम नहि क’ सकैत छथि। एहन संपत्ति पर सब संतान—बेटा आ बेटी—के जन्म से बराबर हक होइत अछि। जौं पिता एहन संपत्ति के एकतरफा ट्रांसफर करैत छथि, त’ दोसर संतान कोर्ट में चुनौती दे सकैत छथि।
स्व-अर्जित संपत्ति में पिता के पूरा अधिकार
जदि संपत्ति पिता अपन मेहनत से कमेल छथि (स्व-अर्जित), त’ कानून हुनका पूरा अधिकार दैत अछि जे ओ अपन मर्जी से ककरो—एक बेटा, सब संतान या कोनो तीसरा व्यक्ति—के दे सकैत छथि।
ई ट्रांसफर वसीयत, गिफ्ट डीड या रजिस्ट्री के माध्यम से भ’ सकैत अछि।
बेटीक सेहो बराबर अधिकार
2005 में Hindu Succession (Amendment) Act, 2005 लागू भेल, जाहि से बेटीक अधिकार में बड़ा बदलाव आयल।
एखन बेटी के सेहो पैतृक संपत्ति में बेटा जेकाँ बराबर अधिकार अछि—चाहे ओकर जन्म 2005 से पहिले भेल हो या बाद में।
सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसला
दोराईराज बनाम दोराईसामी (2026):
कोर्ट कहलकि—जदि संपत्ति पैतृक आय से बनल अछि, त’ ओ संयुक्त परिवार के संपत्ति मानल जाएत।
के.सी. लक्ष्मण बनाम चंद्रप्पा (2022)
सिर्फ प्रेम या लगाव के आधार पर पैतृक संपत्ति एक बेटा के नहि देल जा सकैत अछि।
विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020)
बेटी के जन्मसिद्ध अधिकार के पुष्टि—ओहो बराबर भागीदार छथि।
डी.एस. लक्ष्मैया केस (2003)
स्व-अर्जित संपत्ति के स्पष्ट परिभाषा—एहन संपत्ति पर मालिक के पूरा अधिकार।
संपत्ति विवाद से बचय लेल जरूरी अछि जे परिवार के सदस्य कानून के सही जानकारी राखथि।
पैतृक संपत्ति में सबके अधिकार सुरक्षित अछि, जबकि स्व-अर्जित संपत्ति में पिता के स्वतंत्रता मिलैत अछि।
सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन से अब साफ अछि—
* जहां अधिकार अछि, ओतय बराबरी जरूरी अछि;
* आ जहां मेहनत से कमाईल संपत्ति अछि, ओतय निर्णय के स्वतंत्रता।