
सृष्टि झा
मधुबनी। 1970-80 दशकक गाम केवल एकटा भौगोलिक इलाका नहि छल, बल्कि ओ एक जीवंत संस्कृति, आत्मीयता आ सामाजिक समरसताक अनुपम उदाहरण छल। ओ समयक गामक पहचान छल माटिक दीवार, खपरैल केर छप्पर, खुला आँगन, पोखरि-इनार, खेत-खरिहान आ लोकक बीच गाढ़ अपनत्व। घर भले कच्चा छल, मुदा संबंध अत्यंत मजबूत आ स्थायी छल। माटिक दीवार पर चूना पोतल जाइत छल, आ बरखा केर पहिल फुहार पड़िते जे सोंधी गन्ह उठैत छल, से पूरा गामक प्राणमे नव चेतना भरि दैत छल।
ओ दौर कृषि प्रधान समाजक असली तस्वीर छल। भोरमे मुर्गाक बाँग सुनिते दिनक शुरुआत होइत छल। सूर्योदय सँ पहिने किसान अपन बैल लऽ कऽ खेत दिस निकलि पड़ैत छलाह। बैलक घंटीक टनटनाहट, हलक माटि चीरबाक आवाज आ हरियर खेतक दृश्य गामक संगीत सन प्रतीत होइत छल। धानक लहलह खेत, गेहूँक सुनहर बालि आ सरसोंक पीयर चादर केवल फसल नहि, बल्कि परिवारक आशा, परिश्रम आ भविष्यक आधार छल। खेती केवल पेशा नहि, जीवनक आधारशिला छल।
महिलासभ सेहो एहि जीवनक मजबूत आधार छलथि। ओ सभ घरक चूल्हा-चौका सँ लऽ कऽ खेत-खरिहान धरि हर जिम्मेदारीमे सहभागी रहैत छथि। भोरमे आँगन लीपन-पोतन, चूल्हा पर भोजन बनौनाय, पशुधनक देखभाल आ जरूरत पड़ला पर खेतमे पुरुषक संग कंधा सँ कंधा मिलाकऽ काज करनाय—ई सभ सामान्य बात छल। दुपहरिया मे वृक्ष केर छाँह तरि सभ मिलि भोजन करनाय, हँसी-मजाक करनाय आ सुख-दुख बाँटनाय सामूहिक जीवनक सुंदर परंपरा छल।
ओ समयमे साधन सीमित छल, मुदा संतोष अथाह। आधुनिक सुविधा भले नहि छल, मुदा लोकक चेहरापर संतुष्टिक मुस्कान छल। गाममे जखन पहिल बेर ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आयल, तऽ ओ केवल एकटा परिवारक वस्तु नहि रहल, बल्कि पूरा टोला केर आकर्षण बनि गेल। 1987 मे जखन रामायण धारावाहिकक प्रसारण शुरू भेल, तऽ गामक सामाजिक जीवनमे मानो नव उत्सवक आगमन भेल। रविवार भोरमे लोक नहा-धो कऽ समय सँ पहिने टीवी आगाँ चटाइ बिछा कऽ बैसि जाइत छलाह। जाहि घरमे टीवी नहि छल, ओ पड़ोसीक घर जाइत छलाह। आरतीक दृश्य अबिते अगरबत्ती जराओल जाइत छल, आ राम-सीता केर पात्रकेँ साक्षात भगवानक समान श्रद्धा भेटैत छल। ई केवल धारावाहिक नहि, बल्कि सामूहिक आस्था आ सामाजिक एकताक प्रतीक छल।
गामक चौपाल ओ समयक सामाजिक संसद छल। ओतऽ खेती-बारीक चर्चा होइत छल, बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइक चिंता व्यक्त होइत छल, रेडियो पर देश-दुनियाक समाचार सुनल जाइत छल। बुजुर्गक सम्मान सर्वोच्च छल। बच्चासभ हुनकर चरण स्पर्श करैत छल, सलाह मानैत छल आ अनुशासनमे रहैत छल। रिश्तामे औपचारिकता नहि, सहज आत्मीयता छल।
मुदा समयक संग बहुत किछु बदलि गेल। माटिक घरक स्थान पक्का मकान लऽ लेलनि। सीमेंट, सरिया आ टाइल्स सँ सुसज्जित घर बनल। बिजलीक स्थायी व्यवस्था भेल, रंगीन टीवी आयल, तकर बाद मोबाइल आ इंटरनेट जीवनक हिस्सा बनि गेल। सुविधा बढ़ल, जीवन सहज भेल, मुदा सामूहिकता धीरे-धीरे कम होइत गेल। आब हर घरमे अलग टीवी अछि, मुदा संग बैसबाक समय कम अछि। पहिने एकटा आँगन पूरा परिवारक छल, आब हर कमरा निजी संसार बनि गेल अछि।
विकास आवश्यक अछि, मुदा प्रश्न ई अछि जे की आधुनिकताक दौड़मे हम अपन माटिक सोंधी खुशबू खो दैत छी? असल माटि केवल दीवारमे नहि, व्यवहारमे बसैत अछि। जँ आधुनिक जीवनशैलीक बीच हम अपन संस्कार, आपसी सम्मान आ सामूहिकता बचा सकी, तऽ पक्का मकान सेहो ओहने आत्मीय घर बनि सकैत अछि जकरा स्मरण कऽ आजो लोक भावुक भऽ जाइत छथि।
1970-80 दशकक गाम हमरा ई सिखबैत अछि जे असली समृद्धि केवल आर्थिक नहि, सामाजिक सेहो होइत अछि। खेतमे पसीना बहबैत किसान, आँगनमे गूँजैत हँसी, चौपालक चर्चा आ ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर संग-संग देखल रामायण—ई सभ ओ युगक अमिट पहचान छल।
आइ समय बदलि गेल अछि, मुदा जँ हम अपन भीतरक माटि केँ जीवित राखी, तऽ रिश्ताक ओहि सोंधी खुशबू केँ फेर सँ महसूस कएल जा सकैत अछि।