विद्यापतिक संस्कृतिमे नानक’क स्वागत

देव शंकर नवीन

‘हम जजक अर्दली रही’ शीर्षकक ई पोथी ‘मैं सी जज दा अर्दली’क मैथिली अनुवाद थिक। मूल पंजाबीसँ एकर अनुवाद, चर्चित रंगकर्मी डॉ. प्रकाश झा कएने छथि। श्रेष्ठ आ प्रतिबद्ध पंजाबी लेखक निन्दर घुगियाणवी एकर मूल रचनाकार छथि। ई कृति हुनकर पहिल रचना (सन् 2001) थिकिअनि। अइ आत्म कथात्मक कृति’क पहिल खण्ड’क मैथिली अनुवादसँ सुजान भावक जुनि चौंकथि, जे डॉ. प्रकाशकें पंजाबी अबिते नइँ छनि, तँ ओ अनुवाद कोना कएलनि?…

अनुवाद वस्तुत: बहुकोटीय आचरण होइत अछि। अइ अनुवादमे डॉ. प्रकाश, जाहि न’ब युक्ति’क उपयोग कएलनि अछि, तेहने युक्ति कोनो दिन कवि केदारनाथ सिंह, बांग्लाक कवि शक्ति चट्टोपाध्यातय’क कविता’क अनुवाद लेल अपनौने छलाह। सम्भव थिक जे आओरो बहुत गोटए अपनौने होइथ। मूल रचनाकार’क संग मिलि कए सझिया अनुवाद प्रक्रियामे अइ युक्ति’क उपयोग होइत अछि। मूल भाषा’क ज्ञान नइँ हो आ अनुवादककें बुझाइन्ह जे एकर अनुवाद हमर भाषा लेल उपयुक्त होएत, त’ मूल रचनाकार’क सहयोगें अनुवाद कएल जा सकैत अछि। कोनो सेतु भाषासँ कएल गेल अनुवाद’क तुलनामे एहेन अनुवाद बेसी व्यवस्थित होइत अछि। सेतु भाषासँ कएल गेल अनुवादमे तँ लोप-आगम (लॉस एण्ड गेन)क सुविधा’क कारणें किछु सन्दर्भक उनट-फेर भ’ए जाइ छै। एहेन अनुवादमे दुन्नू तरहें औचित्य बाँचल रहै छै — मूल पाठ’क विश्वासनीयता तँ काएम रहैते अछि, लक्ष्य पाठ’क भाषिक-सांस्कृतिक गरिमा सेहो समायोजित भ’ जाइ छै।

अइ पोथी’क अनुवादक डॉ. प्रकाश स्वयं अनुवाद-विद्यामे विद्या-वारिधि’क उपाधि अर्जित कएने छथि। हुनका अनुवाद-कौशल’क उक्त सैद्धान्ति‍क-बोध निके नाँ छनि। ओ अनुवादकीय मर्म’क सूक्ष्मतासँ परिचित छथि। व्यावहारिक कौशल’क परिपक्वता त’ अभ्यासहिसँ अबै छै, से हिनकहु औतनि। जहाँ धरि अनूदित पाठ’क भाषा’क प्रश्न अछि, तइ मादे कहबाक अछि जे ग्रियर्सन महोदय मैथिलीकें क्षेत्रवाद’क मुकुट पहिरा क’ ततेक टुकड़ीमे बाँटि देलखिन्ह’, जे आइओ मैथिल विद्वान’क प्रस्थान-बिन्दु हुनकहि मान्य होइ छनि, आ मैथिली पूब-पच्छिम-उत्तर-दच्छिन’क सीमांकनसँ संघर्ष क’ रहल अछि। नगरीय-संस्कृतिक संसर्गमे आइ मिथिलाक गाम-गमाति’क बोल-बानि ततबा प्रदूषित भ’ गेलै जे तीन तिरहुतिया तेरह पाक’क व्यवस्था एतए तत्त्वित: रूपायित भ’ गेल। तैं मैथिलीमे, ने कहियो एकरूपता आएल, ने आओत। मानि क’ चल’ पड़त जे आब प्रदूषिते मैथिली हमरा सबहक मैथिली थिक। भिन्न–भिन्न सम्पादक, प्रूफ-संशोधक, प्रकाशन-संस्था भिन्न-भिन्न भाषा-रूप’क उपयोग करै छथि। मैथिलीमे आइ जतेक लेखक छथि, तते तरहक लेखन-शैली अछि। अइ वैविध्यक प्रभाव अहू पोथीमे देखाए पड़ए त’ अजगुत नइँ। मुदा मूल पाठ’क प्राणवत्ता सुरक्षित रखैत लक्ष्य पाठ’क गरिमा बचौने रखबाक अनुवादकीय आग्रह डॉ. प्रकाशमे सभतरि देखाइ छनि।

अनुवाद सम्बन्धी उक्त नीति, निष्ठा आ चेतना अइ अनूदित पोथीमे देखाइत अछि। ई कृति मैथिलीमे निश्चये न’ब पाठकीयता सिरजत। अइ पोथीक गहन अवगाहनसँ मैथिली’क पाठककें न’ब स्वाद’क रचनात्मतक शौर्य तँ देखएबे करतनि, संगहि रचनाकार लोकनिकें ओहेन कौशलपूर्ण भाषा-भंगिमा’क रचनात्माक प्रेरणा भेटतनि जकर परिपाकसँ जीवनानुभूति रचना बनि जाइत अछि (उल्लेखनीय थिक जे घटि गेल घटना’क यथावत चित्रण रचना नइँ होइत अछि, रिपोर्ट होइत अछि)। एकर अलावा फितूरी ऊर्जा’क बलें सफलता’क न’ब क्षितिज तकनिहार किछु संघर्षशील युवाकें न’ब उत्साह सेहो भेटतनि। कारण, ई पोथी निन्दर घुगियाणवी’क जीवन-संघर्ष, काज करबाक फितूर, मेहनति करबाक हूबा आ उन्नतिक अभिलाषा’क जीवन्त आख्यान थिक।
मात्र नवम् कक्षा धरिक शैक्षणिक योग्यता रखनिहार (आर्थिक विवशतामे ओ आगू पढ़ि-लिख नइँ सकलाह, मुदा गएबा’क आ पढ़बा’क स’ख सदैव बनल रहलनि) निन्दर अपन अन्तश चेतनाक बलें थोड़बे दिन पहिने केन्द्रीय विश्व विद्यालय, भटिण्डामे प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस पद पर नियुक्त भेलाह अछि। अइसँ पूर्व ओ न्यायालयमे अर्दली छलाह। चतुर्थ श्रेणीय कर्मचारी रहैत ओ जाहि अनुभवसँ सम्पन्न भेलाह, ई पोथी तकरे परिणति थिकिअनि (अइ अनूदित कृतिक अवगाहनमे दर्ज ई अन्ताश्चेतना मैथिल नवयुवक लोकनिकें अवस्सेह उद्बुद्ध करतनि)। पाठककें वस्तुबोध’क संकेत दैत, मोहाविष्ट करैत, कुल बीस गोट उपकथामे ई कृति, निबन्धित अछि ।

अइ कृतिक हिन्दी अनुवाद ‘मैं था जज का अर्दली’ शीर्षकसँ बहुत पहिने भेल, आनहुँ अनेक भाषामे एकर अनुवाद भेल, टेली-फिल्म बनल, रेडियो फीचर बनल। हुनकर मानब छनि जे चतुर्थ श्रेणीय कर्मचारी’क नि:संकोच लिखल गेल पहिल आत्मकथा हएबाक कारणें ई पोथी लोकप्रिय भेल; मुदा हुनकर धारणा सही नइँ छनि। लोकप्रियता’क डगर’क अनेक शिकारी स्वयंकें अइसँ बहुत बेसी उघार क’ओ क’ सफल नइँ भ’ सकलाह अछि। वस्तुत: अइ लोकप्रियता’क मूल कारण हुनकर जीवन-दृष्टि थिकिअनि। कथासारसँ आइ धरि कोनो लेखक प्रसिद्ध नइँ भेलाह अछि; हिनकर लोकप्रियता’क कारण कथासार नइँ, कथा-निदर्शन’क दृष्टिकोण थिकिअनि। बेपर्द भ’ क’ कहल गेल स’ब घटना स’ब काल प्रभावी नइँ होइत अछि। स्पष्ट, कथाभाषामे निष्कलुष व्यंज्ञ, बाँककथन-भंगिमा आ लक्ष्य केन्द्रिकता’क अछैतो अनुषंगी दृश्यक विवरण-विस्तार हिनकर गद्यकें भव्यता देलकनि अछि।

अइ कृतिमे लेखक यथार्थ-भोग’क मौलिक सन्दहर्भकें दर्ज करैत समकालीन समाज आ न्याय-व्यवस्था’क विकृतिकें निर्ममतासँ, मुदा ईमानदारीसँ उधेसने छथि। से करैत, ओ एतए कोनहु अलंकरण, भंगिमा, भेस अथवा नाटकीयता नइँ अपनौलनि अछि। आत्म वाचन शैली अपनाइयो क’ ओ स्वयं अइ कृतिमे नायक जकाँ प्रस्तुत नइँ भेलाह।

आत्मवृत्तात्मक होइतहु एतए हुनकर स्वर तटस्थे आ आलोचनात्मक रहलनि, अपनहुँ अवांछित आचरण अथवा जानि-मानि क’ कएल गेल उत्क्रतमणकें कतहु नुकेलनि नइँ। विदित अछि जे अर्दली’क नोकरी’क कोनहुँ टा काज सुनिर्धारित नइँ होइत अछि, जज आ हुनकर पारिवारिक सदस्येक सुविधा’क प्रति सचेत रहबे मात्रे हुनकर काज होइ छनि। तें ई नोकरी पाबियो क’ ओ सर्वथा असन्तुष्टे रहलाह, विनोदी वृत्तिक कारणें लेखनमे कतहु हास्य, कतहु अवमानना उपजबैत रहलाह, पारिवरिक सदस्यसभक प्रसन्नता लेल नोकरी करैत रहलाह, कारण हुनकर खानदानमे ई पहिल सरकारी नोकरी छलनि; मुदा हुनका बूझल छलनि जे ओ अइ काज लेल जन्म नइँ लेलनि अछि।

कोशीय अर्थमे सेवक (अर्दली=ऑर्डरली=आदेशपाल=सेवक) सेवा करै लेल होइत अछि। मुदा स्वामी जखन सेवा’क अर्थ विकृत क’ दिअए, त’ व्यवस्था लेल क्रिया बोझ बनि जाइत अछि। ध्वस्त मानवीय संवेदना एतए व्यंग्य आ विकृति उत्पन्न’ कएने अछि। जीवनानुभूति ईमानदार होअए, राजनीतिक विमर्श कर्ता’क धौना पर वैताल जकाँ चढ़ि नइँ बैसए, त’ भाषा’क चमत्का‍र स्वत: स्फूर्त्त भ’ जाइत अछि। अइ कृतिक ‘अर्दली’कें एहने चमत्कार’क अनुपम धन भेटलैक अछि।

समाजमे सर्वथा पढ़ल-गूनल-व्यवस्थित मनुक्ख मानल जाइबला जज, जिनका मुँहें भदेश भाखा सुनबाक अवसर किनकहु नइँ भेटै छनि; जिनकर गुह्य पक्ष’क जनतब ने कोनो जनसामान्यकें होइ छनि, ने ओकील-मुख्तारकें आ ने ई कोनो अदालती दस्तावेजमे सुरक्षित होइत अछि। निन्दर, ओही जज’क अहंकार, तिरस्कांर, अमानवीयता देखि क्षुब्ध रहै छथि। कोनो एक्के नइँ, पहिल’क बदली भेल, दोसर आएल, दोसर गेल तेसर आएल…सबहक धच्चार थोड़े दिन बाद ओहने। प्रारम्भमे स’ब साधारणे मनुक्ख’ जकाँ प्रकट होइथ। मुदा अदालतसँ घ’र अबिते हिनका लोकनिक शब्दक-बोध गारिसँ शुरू भ’ क’ गारिए पर समाप्त होइन — पमरिया, साला, लुच्चा, हरामी, कुकूर, भाँड़, अन्हरा…निन्दर आ जज’क परस्पर बेवहार सदतिकाल निदंक रहलनि। ओ निन्दिर’क गायन’क प्रशंसा करथि आ कि निन्दा, दुन्नूमे गारि फेंटल रहनि।…अकिंचन अर्दली’क गँहिकी नजरि स’ब किछु देखैत रहल – प्रभुत्व सम्पन्न जज’क रोब-दाब, अधीन स्थर आ समकक्ष’क संग शासकीय संवाद, पारिवारिक-कौटुम्बक आचार– स’ब कथू’क सूक्ष्म विश्लेषण करैत रहल। भोगल यथार्थ व्यक्त करैत लेखक अइ कृतिमे जीवन्तता’क अलावा जज’क ओही द्वैधपूर्ण स्वभाव’क जीवन्त रहस्योद्घाटन कएने छथि। एहेन एकान्त अनुभूति’क रचना आ रचनाकार सर्वथा न’ब स्वाद मैथिली’क पाठक लोकनिकें निश्चये न’ब लगतनि।

साभार : हिनकर फेसबुक सं

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