सभ सँ अधिक भ्रष्टता विवाह-विधिमे आएल

नई दिल्ली। मिथिलाक अधिकांश ब्राह्मण समुदाय अपन परम्परासँ भ्रष्ट भए चुकल छथि। सभसँअधिक भ्रष्टता विवाह-विधिमे आएल अछि। आब विवाहक लेल वेदी बनएबासँ बेसी जयमालक लेल मंच बनएबा पर ध्यान दैत छथि। ब्राह्मविवाह केँ गान्धर्व-विवाहमे बदलबाक लेल उताहुत मैथिलकेँ आब की कहल जाए।

एहिसँ नीक तँ आने ठामक लोक जे अपन वैदिक परम्परा केँ बहुत हद धरि सम्हारि रखने छथि। वेदी केहन बनाबाक चाही तकर विधि वाजसनेयि विवाहक पद्धतिमे एहि प्रकारें अछि-

तत्र कन्याहस्तेन षोडशहस्तपरिमितमण्डपन्तद्दक्षिणदिशि पश्चिमान्दिशिमाश्रित्य मण्डपसंलग्नमुत्तराभिमुखङ्कौतुकागारं मण्डपाद् बहिरैशान्यां जामातृचतुर्हस्तमितसिकतादिपरिष्कृतां तुषकेशशर्क्करादिशून्यां वेणुनिर्मितां वेदीञ्च कारयेत्।

शास्त्र कहैत अछि जे कन्याक हाथसँ 16 हाथ लंबा आ चौड़ा मण्डप बनबाक चाही। ओकर दक्षिण दिशामे पश्चिम दिश अर्थात् दक्षिण-पश्चिम कोण मे उत्तरदिसक एकटा कोबरा घर बनाबी जकर मुँह उत्तर दिस रहए।

मण्डपसँ बाहर ईशान कोण अर्थात् पूर्व-उत्तर कोणमे जमायक हाथसँ चारि हाथ लंबा-चौड़ा आ ऊँच वेदी बनाबी जाहि पर बालू आदिसँ भरि परिष्कार कएल गेल हो, मुदा भुस्सा, केश, गुड़-शक्कर आदि नहि लागल हो, एहन बाँसक वेदी बनाबी।

एकर अर्थ ई भेल जे वेदी पुरुषक हाथसँ चारि हाथ लंबा-चौड़ा आ ऊँच होएबाक चाही। मिथिलाक पद्धति सैह कहैत अछि। की आई मैथिलकेँ एतबो ओकाति नै रहि गेलनि जे आँगनमे विवाहक लेल एहन वेदी बनौताह। बाँसक एहन वेदी बनएबामे मुश्किलसँ एक घंटा लगतैक। गामक बढ़हीकेँ जँ कहल जाएथ तँ ओ झटसँ बननाए देताह।
मुदा नहिं, मैथिल लोकनिकें एहि दिस ध्यान नहिं छनि।

मैथिलेमे सोतिपुरामे एकर दृढ़तापूर्वक पालन कएल जाइत अछि। श्रोत्रियक गामक बढ़ही केँ लाल धोती देल जाइत छै, संगहि रुपया देल जाइत छै। बाँसक बनल वेदीक ऊपर केराक कोशा खोंसल जाइत छै। सोति मिथिलाक परम्पराकेँ गछारि कए रखने छनि।
मुदा शेष ब्राह्मणलोकनि की करैत छथि? ओ जे कए रहल छथि से नीचाँ फोटोमे देखल जा सकैत अछि। एहन स्थितिमे जँ सोति अपनाकेँ अलग रखबाक प्रयास करैत छथि तँ कोन बेजाए करैत छथि?

जे जतेक नीचाँ खसब से ततेक छोट कहाएब- ई तँ प्रकृतिक नियम छै।

एक हाथक वेदी बनाए विवाह करौनिहारकेँ जँ हमर बात खराब लगलनि तँ आशा करब जे हुनक गाममे अगिला कन्यादान आ विवाहमे शास्त्रक अनुकूल वेदी आ मण्डपक व्यवस्था होएत!!!

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