दम तोड़ैत मधुबनीक लहठी उद्योग

मधुबनी। बिहार विभाजनक बाद रोजगारक नऽव अवसर आ आय के श्रोत मे बढ़ोतरी लेल प्रयास अपेक्षित छल। मिथिलांचल ओना तऽ उद्योगक क्षेत्र मे बहुत अग्रणी आ विकसित कहियो नहि रहल किन्तु, जे उद्योग छोट-छीन स्तर पर चलैत रहय तकर हाल सेहो बदहाल कहल जाय। कएक टा पारम्परिक लघु उद्योग छल मिथिलांचल मे, ताहि मे मधुवनीक लहठी उद्योगक सेहो बेस नाम छल। मात्र मधुबनी टा मे करीब तीन साढ़े तीन सौ परिवार छल जकर रोजी रोटी छलैअ लहठी उद्योग। आइ मुश्किल सऽ 35वा 40 टा परिवार कहुना एहि उद्योग सऽ जुड़ल अछि बाकी बचल परिवार या तऽ आन रोजगार सऽ जुडि़ गेल वा पलायन कऽ गेल अछि। तकर मुख्य कारण सरकारी उपेक्षा आ आधुनिकता केर चकाचौंध। शिल्पकारक आर्थिक संरक्षण क अभाव कही वा कच्चा मालक आसमान छूवैत दाम कही। कुल मिला कऽ एहेन कतेको कारण सऽ शिल्पकार एहि रोजगार सऽ विमुख भऽ गेल।
जहां धरि मधुबनी जिला मे लाह उद्योगक उद्ïभवक प्रश्न छैक तऽ क्षेत्रीय मिथक तथा अन्य श्रोत सऽ प्राप्त जानकारीक अनुसार 1757 ई। के करीब वैश्यक एक उपजाति, जकरा स्थानीय बोल चालक भाषा मे लहेरिया कहल जाइत अछि, केर प्रवेश मधुबनी मे भेल। एहि जाति द्वारा लहठी उद्योग प्रारम्भ कएल गेल।
ऐतिहासिक विवरणक अनुसार अंग्रेज द्वारा बंगाल सूबा पर राजनीतिक आधिपत्य कायम केलाक बाद राजमहल, मुर्शिदाबाद, विष्णुपुर आदिक वस्त्र शिल्पकार पर अत्याचार बढ़ल। पलायन के क्रम मे इ जाति बंगाल के छोडि़ नदी सऽ अच्छादित पुरना दरभंगा जिला मे नाव द्वारा प्रवेश कएलक। मधुबनीक लहेरिया जाति के संबंध ओही पलायन सऽ जुड़ल अछि। संभवत: तत्कालीन वणिक जाति द्वारा एहि लहेरिया जाति के ओहि समय संरक्षण नहि प्रदान कएल गेल। परिणामस्वरूप इ जाति शहर के अंतिम छोर पर जा कऽ अपन उद्योग कहुना प्रारम्भ करबा मे सक्षम भेल। बाद मे सांस्कृतिक आत्मसातक क्रम मे लाह उद्योग सऽ जुड़ल लोक चूड़ी बजार आ भौआरा आदि मोहल्ला मे सेहो बसैत गेल किन्तु अद्यावधि प्राचीन आश्रय स्थल लहेरिया गंज के नाम सऽ जानल जाइत अछि। इ अलग बात छैक जे आइ ओहि ठाम मुश्किल सऽ 25 वा 30 परिवार शेष रहि गेल अछि। बाद मे जखन व्यवसाय मे वृद्धि भेलैक तऽ आबादी के बढ़ोतरी के देखैत इ जाति राज नगर, भगवतीपुर, जय नगर, नरार, बेनी पट्टïी, झंझारपुर, मधेपुर, भदुली, देवधा आदि स्थान पर बसैत गेल। जहां धरि मधुबनी क्षेत्र मे लाह निर्माणक तकनीक केर प्रश्न छैक तऽ प्रारंभ मे एकर निर्माण माटि आ लाहक चपड़ा के मिला कऽ कएल जाइत छल लेकिन 20वीं शताब्दी के तेसर दशक मे वा तकर बाद माटि एवं लाहक चपड़ा मे रोगन एवं रंग सेहो मिलाओल जाए लागल। 1950 के बाद एहि मे पाउडर के प्रयोग सेहो होमय लागल किन्तु वर्तमान मे एहि मे मीना आ स्टीकर के प्रयोग बेसी भऽ रहल अछि। मिथिलांचलक लहठी उद्योगक विशेषता रहल छैक जे एहि मे पूरा काज हाथ टा सऽ कएल जाइत अछि जाहि मे 80 प्रतिशत महिलाक भागीदारी रहैत छन्हि। दु:खद बात इ जे विगत दू तीन वर्ष सऽ एहि उद्योग मे भारी उथल-पुथल भेल तकर मौलिक कारण इ रहल जे पीढ़ी दर पीढ़ी सऽ काज करैत शिल्पकार दोसर धंधा दिस आकर्षित भेल गेल तकर पाछू के कारण इहो छैक जे कच्चा मालक स्थानीय स्तर पर अकाल भऽ गेलै। लहठी मे प्रयुक्त कच्चा माल बाहर सऽ आनय पड़ैत छैक जकर दर सेहो उच्चतम रहैत छैक। विदित हो कि लहठी मे कच्चा मालक प्रयोग लाहक चपड़ा, स्टीकर, रंजन, मीना आ चमकीला तारक रूप मे कएल जाइत अछि। उक्त सामानक मूल्य मे 20-25 वर्षक अंदर अप्रत्याशित वृद्धि भेलैक। परिणाम इ भेलैक जे ताही अनुपात मे लाह सऽ बनल चूड़ी आदि महग सेहो होइत गेलैक आ स्थानीय ग्राहक एहि सऽ विमुख होइत गेल।
विगत 15-20 वर्ष सऽ लहठी उद्योग सऽ जुड़ल महिला सुशीला देवी कहैत छथि लाहक चपड़ा पहिने 40-45 रुपैया प्रति किलो भेटैत छल आइ तकर मूल्य 160 सऽ लऽ कऽ 200 रु प्रति किलो भऽ गेल छैक। ठीक तहिना 50 ग्राम स्टीकर के मूल्य 9-10 रुपैया छलैक जे आब 40-45 रुपए भऽ गेलैक। एक पुडिय़ा मीना सेहो 9-10 रुपैया मे भेटि जाइत छल मुदा तकर मूल्य सेहो बढि़ गेलै। वस्तुत: कच्चा मालक आसमान छूवैत दर एहि उद्योग के बंद करवा लेल विवश कऽ देलक स्थानीय शिल्पकार के।
कारण जतेक रहल हो मुदा एक बात सत्य जे एहि लचरैत उद्योग सऽ एक दिस जतय मिथिलांचल के राजस्वक घाटा भए रहल छैक ओत्तहि कएक टा शिल्पी परिवार भुखमरी के कगार पर ठाढ़ अछि। आब पुन: शेष बिहारक लघु उद्योग मे जान फुकवाक प्रयास भए रहल अछि तखन देखी जे ओहि पारम्परिक लहठी उद्योग पर सरकारक कुंभकरणी नींद कहिया टूटैत अछि?

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