मिथिलाक अमूर्त संस्कृति : आवाहन संगीत ‘रसनचौकी’

सीताक जन्म स शुरू भेल अहि परंपरा के एखनहु मैथिली समाज मे आवाहन वाद्य वा आवाहन संगीतक रूप मे मान्यता प्राप्त छैक आ सामाजिक प्रयोग मे देखल जा सकैछ। एखनहु मिथिलाक समाजक विभिन्न जाति मे मान्यता अछि जे अनुष्ठानिक कार्य रसनचौकी वादन के बिना सम्पूर्ण नहि मानल जा सकैछ।

काश्यप कमल

मिथिला प्राचीन काल स कला, साहित्य आ संस्कृति के केंद्र पोषक रहल अछि। रामायण में उल्लेखित अछि जे ज़ख़न सीता धरती स अवतरित भेलीह त’ वातावरण मे विशेष प्रकारक वाद्य यंत्र गुंजायमान भेल।  याएह लोकवाद्यक समूह “रसनचौकी” छल। सीताक जन्म स शुरू भेल अहि परंपरा के एखनहु मैथिली समाज मे आवाहन वाद्य वा आवाहन संगीतक रूप मे मान्यता प्राप्त छैक आ सामाजिक प्रयोग मे देखल जा सकैछ। एखनहु मिथिलाक समाजक विभिन्न जाति मे मान्यता अछि जे अनुष्ठानिक कार्य रसनचौकी वादन के बिना सम्पूर्ण नहि मानल जा सकैछ।
मिथिलाक अहि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत ‘रसनचौकी’ के ‘फोक आर्केस्ट्रा’ सेहो कहल जा सकैछ। अहि वाद्य के अपन अलग वैज्ञानिक प्रभाव सेहो छैक जे वैज्ञानिक शोध मे सेहो प्रमाणित भेल अछि। रसनचौकी के वादन स’ उत्पन्न ध्वनी स’ वातावरण में उपस्थित अनेको जीवाणु व विषाणु नष्ट भ जाइत छैक। संभवत: प्राचीन समाजक कर्मगत जाति व्यवस्था के अंतर्गत रसनचौकी लोकवाद्य के संरक्षण व संवर्द्धनक दायित्व जाति विशेष के आवंटित भेल छल। जाही कारण स रसनचौकी एक जाति विशेषक उपक्रम बनि क रही गेल। समाज मे अहि जातिक स्थिति उपेक्षित रहल, परिणामस्वरूप वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे अहि वाद्यक आ अहि वाद्य के बजेनहारक स्थिति चिंताजनक बनल अछि।
सीताक जन्म स शुरु भेल इ परम्परा एखनहु समाजक कार्यव्यापार मे देखल जा सकैछ।  मिथिलाक लोकवाद्य रसनचौकी वादन के प्राचीनतम लोक कलाक श्रेणी मे राखल जा सकैछ। रसनचौकी एकटा फुंकि क बजबै बला वाद्य के नाम छैक मुदा एकर बादन के लेल पाँच टा वाद्यक समूह अनिवार्य छैक। अहि मे फुंकि क बजबै वला- कारा, सुर आ कतौ-कतौ पीपही आ पीट क बजबै वला – मे तबली, डिग्गी, खुरदक आदि मुख्य अछि। बजेनहार के आभाव वा वाद्य के आभाव मे रसनचौकी समय-समय पर रूप परिवर्तित करैत रहल अछि। ढोल-पीपही सेहो एकर एकटा रूप ठीक। एकर वाद्य यंत्र पर कालांतर मे अनेकों प्रयोग भेल अछि खुरदक, पीपही आदि देखल जा सकैछ। ढोल-पिपही बजबै मे मुख्यतया चारि टा कलाकारक आवश्यक छैक ओतहि रसनचौकी के लेल कम स कम पाँच गोटा। ओना आभाव मे ढ़ोल-पिपही तीनो गोटा भए जाइत छैक। एकटा मत इहो अछि जे रसनचौकी के परिमार्जित रूप वर्तमान शहनाई थिक। ओना ई एकटा अलग आ गंभीर शोध के विषय थिक।
रसनचौकीक स्वर मे मुख्यरूप स मिथिलाक पारंपरिक आ अनुष्ठाणिक गीत सुनाबा मे अबैत अछि मुदा कतहु-कतहु कलाकार सब मैथिलीक लोकगीत सेहो बजबैत छथि। वर्तमान मे मधुबनी जिलाक भटसिमरि गामक महेंद्र राम, कमल राम, आदि एकर गुरु छथि जे नव पीढ़ी के अहि वाद्य के बजेनाइ सीखा रहल छथि।

काश्यप कमल

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