के भुसकौल ?

के भुसकौल ?

— की तों भुसकौल छह ?
— के कहत हमरा भुसकौल ?
— भुसकौल नहि छह तँ एहि शब्दक अर्थ कहह।
— पुछहुन गs पंडित गोविन्द झा सँ।

संयोगवश हम सुनितहिं रही। मन पड़ल कविवर सीताराम झाक लोक-लक्षण – कही पानि तँ आनए पान, … ई लच्छन तँ बुझू अकान, भूसा पेरक कोल्हु समान। ताहि दिन तँ ई अर्थ कविवरक कल्पना बुझाएल, परन्तु जहाँ मन पडल जे सिमरिया घाट लग भुसकौल्ह नामक एक गाम कि आँखि खुजि गेल। ताहि दिन नार-पोआर पानि मे भिजाए पेड़ि कें भूसा ( चारा ) बनाओल जाइत छल। कविवर से कल्पना कए नहि, अपना आँखिए देखि लिखने होएताह।

(पंडित गोविन्द झा के फेसबुक वाॅल सं)

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