सीता जकां बनय परत सभकें

निवेदिता मिश्रा झा

अशिक्षाक अन्धकार मे मिथिलाक बहुत पइघ आबादी पड़ि गेल छल। पंडित कहाबय बला लोक आखर बिसरि गेल। श्रुत कहाबय लागल छल। दू चारि टा गाम बउआएब तखन कोनो आखर चीन्हय कि पढ़य बला लोक भेटितय। पत्रा बांचय बला, कथा सुनब’ बला कि संस्कार देब’ बला पंडित सेहो कमे रहथि। कोना आँतर मे बसल विद्वान ततेक ने बन्द मानसिकता के रहथि जे टीका मीमांसा, दर्शनक पोथी लिखथि, चर्वित चर्वण करइलय काशी धरि पहुँचि जाथि परंच अपना समाजकेँ शिक्षा ज्ञान देवा दिस प्रवृत्त नहिं होथि। सैकडो कि जे हजारो वर्ष सँ जखन पुरूष श्रुत पंडित होथि तखन स्त्राीगण सहजहिं किएक ने होएतीह। राजा लोकनि अल्पज्ञानी से होथि। हुनका बुझाइन जे ओ जखन राजकाज चला रहल छथि, कृषक खेत उपजा रहल अछि, गोपालक आ मलाह अपन काज बिनु शिक्षा के क’ रहल अछि त’ शिक्षाक की आवश्यकता। किछुए प्रबुद्ध-पंडितकेँ ज्ञान आ अक्षरज्ञानक महत्ता बुझाइत छलन्हि, तैं बाँचल रहल आखर।
मिथिला मे सीता समस्त नारी जातिक लेल एकटा आादर्श। सीता सन धिया सभहक लालसा रहैत छन्हि। कहल जाइत अछि जे कथा अछि जे एक बेरा सीरध्वज जनक जी के राज्य मिथिला मे वर्षा नै भेल। लोग अकाल सँ पीड़ित होमय लागल। लोगके दशा देखी के राजा जनक ऋषि-मुनि आ विद्वान के सभा बजेलैंथ। एही सभा मे उपस्थित विद्वान सँ पूछलैंथ जे हम धर्मानुसार शासन करैत छिं मुदा फेर अकाल के की प्रयोजन अछि। एही पर विद्वान कहलैंथ महराज यदि अहाँ स्वंय अपन हाथ सँ हल जोतब तऽ देवराज इन्द्र के कृपा होयत। विद्वान सभ जेहि स्थान पर हल जोतवा के लेल कहने छलैंथ ओ आय के पुनौरा नामक स्थान अछि। इ सीतामढ़ी जिला मे स्थित एकटा गाम अछि। एही स्थान पर जेखन जनक जी हल चलाबी रहल छलैथ ताहि क्रम मे हुनक हल के नोक जाहि के सीत सेहो कहल जाइत अछि से कुनो धातु सँ जा के टकराबै के आवाज आयल। ओही स्थान सँ हल आगू बैढे नै रहल छल। ताहि पर जनक जी ओही स्थान सँ मैईट हटाबी के देखलैंथ तऽ ओतय सँ एकटा कलश निकलल। कलश के मुह हटेला पर जनक जी देखलैंथ जे ओही मे सुन्दर सन कन्या अछि। जनक जी कन्या के अपन पुत्री बना लेलैंथ और हिनक नाम सीता राखीलैंथ। राजा जनक जी सीता के अपन संगे अपन राजधानी जनकपुर लऽ एला। एही ठाम सीता के लालन-पालन राजकुमारी जका होमय लागल। सीता जनक जी के पुत्री हेबाक कारणे जानकी कहाबय लगलि। हिनके नाम पर जनकपुर के जानकी धाम कहल जाइत अछि।
जे सीता देवी बाललीला करैत खेल-खेलमे शिव-धनुष उठा लेने छलीह, जे शिव-धनुष कदापि श्रीराम (साक्षात्) नारायण छोडि दोसर कियो हिला तक नहि सकलाह…. ततेक शक्तिशाली देवी रहितो स्वयं सीता कहियो कोनो भी चरित्र लीलामे हिंसात्मक नहि बनलीह अछि आ यैह बात लेल विद्वान् आ शास्त्रमत-पारंगत हिनकर चरित्रगान करैत दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, गौरी, सती, सावित्री, अनसूया, मन्दोदरी आदि अनेको विलक्षण गुण सम्पन्न देवीरूप मे सीताकेँ सर्वश्रेष्ठ घोषणा करैत छथि।
सीताक बाललीला गान करैत जगत्‌गुरु रामभद्राचार्यजी महाराज हालहि अपन सुन्दर काव्य “श्रीसीतारामकेलिकौमुदी” प्रकाशित कयलनि अछि जे अत्यन्त पठनीय आ रस-रमणीय अछि।

दू अति महत्त्वपूर्ण फलादेशक चर्चा करब:
जेना सीताक उपनाम ‘मैथिली’ छन्हि, से हिनक चरित्रगान करनिहार व मानव जीवनमे मैथिली-मिथिलाक अस्मिता-प्रति कर्तब्यनिष्ठ, सजग, सक्रिय सहयोगी बननिहार साक्षात् जनकनन्दिनी सीताजीकेँ प्रसन्न करैत छथि आ परमसुख केर आनन्द प्राप्त करैत छथि।
जीवनक अनमोल प्राप्ति थिकैक माता-पिता-गुरुक चरण-सेवक बनब। सीता-चरित्रमे सेवा व समर्पणक अनुपम आ अत्यन्त सशक्त प्रस्तुति कैल गेल छैक। अनुगामी भक्त जीवन-भवसागर सहजता सँ पार करैत छथि।
प्राचीन कालीन मैत्रेयी कात्यायनी आ गार्गी केर चर्चसँ आगाँ कोनो लाभ नहिं बुझना गेल। भारतीक कालजयी निर्णायकक भूमिकाके कहाँ कियो महत्व देलन्हि। से दितथि त’ निछच्छ अक्षरहीन किएक कएल गेल? किन्तु ओं सब अन्हार इजोतक इतिहास हमर विषय नहिं अछि। विषय अछि आधुनिक कालक स्त्राीगण की कए रहल छथि। आब दुनिया एकटा विशाल गाँव भ’ गेल अछि, अइ गाम मे मिथिलाक नारीक की स्थिति छन्हि। आपत्काल मे नारी अपन सामर्थ्य देखौने छथि एखनहुँ।

निवेदिता मिश्रा झा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *