ओ भीड़ नहि छलाह

कलाक कोनो जाति नहि होइत छै । कलाक कोनो धर्म नहि होइत छै । कला ओहन सभ किछु सँ ऊपर होइत छै जे मानव मन कें आपस मे जोड़ैत छै ।
तें ककरो शब्द बजैत छै, तँ ककरो कूची । ककरो भंगिमा मे भाषा मुखरित होइत छै तँ ककरो व्यवहार मे । ओना तँ ई अर्जित सेहो होइत छै, मुदा मूल रूप सँ ई रक्त मे होइत छै, जे यदाकदा लोकक समक्ष सोझाँ अबैत रहैैत छै ।
तें क्यो रवि वर्मा भ’ जाइत छथि, तँ क्यो मकबूल फिदा हुसैन । तें किनको कूची मोनलिसाक पेंटिंग बनि जाइत छनि, तँ कोनो सामूहिक कूची मिथिला चित्रकला !
तहिना कोनो कलम किनको विलियम शेक्सपीयर, तँ किनको कालिदास । कोनो कलम विद्यापति, तँ कोनो रवींद्र नाथ टैगोर ।
अर्थात कलाक क्षेत्र ततेक विस्तारित छै, जकरा कोनो एक सीमा मे राखल नहि जा सकैत छै । शिव कें नटराज कहल जाइत छनि । ओतहि सँ कहल जाइछ अभिनय कलाक सूत्रपात भेलै । तें ओ अभिनयक प्रारंभ छथि ।
एहि अभिनय कलाक एक दीर्घ परंपरा रहल अछि । संपूर्ण विश्व एहि सँ भरल-पुरल अछि । आइ हम, अहाँ, ओ तँ तकर इकाई भरि नहि छी । मुदा एहि अनंतक विस्तार मे वएह एक इकाई कोनो काल-विशेष मे, कोनो क्षेत्र-विशेष मध्य आदरणीय, प्रणम्य बनि जाइत अछि । हम एही लेल तँ मोन पाड़ैत रहैैत छी चार्ली चैप्लिन कें, तँ फाल्के, राजकपूर कें । एहि काल-विशेष मे तें हमरा इरफान खान मन पड़ैत छथि । हिंदी सिनेमाक एक तारा ।
ओ तारा, ध्रुवतारा बन’ सँ पूर्वहि मिझा गेल । ओ अपन संपूर्ण विस्तार सँ पूर्वहि सिकुड़ि, अदृश्य बनि गेल । कारण बनलै तकर एक बीमारी– कैंसर ! ई कैंसर ओना तँ लाइलाज नहि रहलै, मुदा एहन-एहन घटना सँ कखनो-कखनो विश्वास होब’ लगैत छै जे एखनो कैंसर लाइलाज अछि ।
असल मे एना होइत छै, जे एहि तरहक स्थिति मे भावना प्रमुख भ’ उठैत छै, आ विश्वास अविश्वसनीय भ’ रूढ़ भ’ जाइत छै । तें ई मानल जयबाक चाही जे इरफान खान लग, अभिनय कलाक एतबे फाँट निहुँछल छलनि, जकरा ओ बहुत इमानदारी सँ निर्वाह कयलनि । हुनका ई बुझल छलनि जे हमर अंत निकट अछि, तकरा ओ शब्दबद्ध सेहो कयने रहथि । मुदा जेना आम भावना होइत छै, अंत समय मे जीबाक मोह बढ़ि जाइत छै, से हुनको संग भेलनि । मुदा हुनक ओ मोह परास्त भ’ गेलनि, हुनक मायक भावना हुनका सोर पाड़ि लेलकनि, ओ चल गेलाह ।
मुदा, जएह अल्प समय हुनका प्राप्त छलनि, ओ तकर अतिरिक्त जा क’ निर्वहन कयलनि । जखन कि अधिकांश तँ तकर क्षणांशो निर्वाह कर’ मे कंजूसी क’ जाइत छथि । तें ओ भीड़क एक इकाई भ’ क’ रहि जाइत छथि । मुदा इरफान से भ’ क’ नहि रहलाह…
एखन हम सभ कोरोना कहर बीच फँसल छी । असुरक्षा बोध मन मथने अछि । एहना मे इरफान खानक चल जायब आर टीसैत अछि…
ओह, हे देखू ! काल्हि ओ गेलाह, एखनहि डाइरी लिखैत-लिखैत बूझल भेल जे ऋषि कपूर सेहो चल गेलाह ! आ सेहो कैंसरे सँ !…
ओह ! ओह ! अपन होस मे जे पहिल फिल्म देखने रही, ओ छल ‘बॉबी’ !…

(विभूति आनंद जी कें फेसबुक वाॅल सं)

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