
एहि कोरोनाक लपेट मे सीता सेहो आबि गेली । सोशल मीडिया कें एहि लेल धन्यवाद । आ एहन कुत्सित दिमाग राख’ वला ओहि समूह कें सेहो धन्यवाद । एहन धन्यवाद ओहन किछु राजनीतिज्ञ कें सेहो, जे सीताक मादे किछु वर्ष पूर्व अशोभनीय वक्तव्य प्रसारित कएने रहथि !
आइ सीता नवमी अछि । ई सभ साल होइत अछि । मुदा एहि साल विशेष अछि । ओ एहि लेल विशेष जे एहि साल कोरोना वायरसक लसेर मे सीता सेहो आबि गेली । सीता नेपालवाली भ’ गेली ! आ तुलना एना, कि होअय अपन कपार अपनहि फोड़ि ली । जेना सोनिया गांधी इटलीवाली, तहिना सीता नेपालवाली ! ई भकुआयल-भक्तिक शिखर थिक । एकरा आर की कहल जाय !
आइ सीता नवमी अछि । सोचैत छी, दोष ओही समूह टाक नहि छी । मूल दोष अछि हमर शिक्षा-पद्धति, आ ओकर पाठ्यक्रमक । आमजन कें अपन अतीत कथा नहि बुझल छै । ओकरा पढ़ले नहि छै, पढ़ाओले नहि गेलै । एहि सभ तरहक विषय कें मोजरे नहि देल गेलै । ई भूमि कोना बनलै, मिथि के रहथि, मिथिला की रहै, मिथिला कहिया भेल, के सभ भेलाह राजा, विदेह के रहथि, कतेक भेलाह विदेह, जनक कतय रहथि, सीता कोना भेली, धरतीक नक्शा की रहै, ओ कतय पाओल गेली, पोसल कोना गेली, कोना, कहिया, किएक भेलै सुगौली संधि, तकर संग-संग कोना एहि भूमिक बासिंदा कें सांस्कृतिक ओ भौगोलिक रूप सँ भाँगल गेलै…
बहुत रास पृष्ठ इतिहासक, बहुत रास किंवदंती ओहि इतिहासक संग । मुदा अछैत एहि सभहक, सीता जीबैत रहलीह । तें राम जीबैत रहलाह । अपन आस्था मे, विश्वासक संग । तहिना सीता, बेटी बनलि रहली, जीबैत रहली, अपन नैहर मे, नैहरक माटि संग । ओ अपन व्यवहार सँ, ओ अपन शील-स्वभाव ओ संस्कार संग एहि रूप मे संसार समक्ष उदाहरण बनलीह, जे मानुषी सँ देवी बनि विदित भेली । तें तेहना सनक सांस्कृतिक ओ आध्यात्मिक परिवेश मे एहि तरहक टिप्पणित्यादि कचोटैत अछि ।
तहिना एक बात आर कचोटैत अछि, आ से जहिया सँ तर्क आ तुक बूझ’ लगलिऐ, तहिये सँ । ओ कचोट आइयो अछि । सीता मिथिला-माटिक बेटी छली, ओ देवी कोना भ’ गेली ! घर-घर प्रचलित कथा अछि जे ओ जन्म लेने छली, ह’र जोतैत काल राजा जनककें भेटल रहथिन । किसान जनक हुनका अपन संग आनि, राजकुमारीक गरिमा देने छला, राजकुमार सँ विवाह धरि करौने छला ।
आब लोच एत’ बनल जे ओ प्रकट भेल छली ! अवतरण भेल छलनि हुनक ! आ कही तँ एत्तै सँ बेटी कें देवी बनयबाक प्रचलन शुरू भ’ गेल । धर्म-प्राण ई भूमि, तर्क नहि कयलक । क’ल जोड़ि लेलक । ओ जोड़ल क’ल, एखनहुँ जोड़ल अछि । सीता तें देवी छथि, रहती । तखन तँ कही एसगर वृहस्पतियो झूठ होइत रहल छथि । तें हमरा सन एक अकिंचन सेहो झूठ…

तें की ! हमर मोन मे सीता, एखनो पहिने मिथिला-भूमिक धिया, माने हमर सियाधिया, तकर बादहि आन किछु । से, किछु ताही सभ तरहक मन:स्थितिक संग जुड़ल ई हमर किछु नव-पुरान चरिपतिया आजुक डाइरी-पृष्ठ पर :
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जाधरि सियाकुमारी रहली,
अप्पन जनकक धाम
ताधरि आंगन, बाड़ी-झारी,
बनल रहल अभिराम
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सियाकुमारी, महरानी भऽ,
चलली अवधक द्वार
मिथिलादेसक छाती फाटल,
कानल हबोढकार
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सीता, मैथिल-कन्या सन,
जीली घाड़ झुकाय
अपन मान-मर्यादा संगे,
रहली राम समाय
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निर्वासन मे सीता संगे,
कहाँ अपन क्यो संग
राजा, रमकल मोन सँ,
करिते रहलनि तंग
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तन-मन पीड़ा लऽ कऽ ओ,
जौंआँ बेटा संग
रहली सीने ठोर, न बजली,
तैयो राम-प्रसंग
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सदा सोहागिन सीता रानी,
राम न कयल दुलार
ऐ तरहक नारी-शोषणपर,
भऽ नै सकल विचार
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सीता-जीवन-कथा कहै’ अछि,
शोषित नारी-रूप
एक अपन अस्तित्व ले’ चिंतित,
दोसर, सीटल भूप
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पड़ल अकाल, काल,
मिथिला कें ग्रासल
जनके लाथें जानकी,
जनु भेटली त्रासल
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सीता भेटली माटि मे,
लेलनि जनक उठाय
हुनके ठोरक बोल जे,
रहलौं सभ मुसकाय
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फुलबारी मे देखि कऽ,
दुहिता गेली लोभाय
तकरे परिणति भेल जे,
शोषक भेला जमाय
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जनकक बेटी जानकी,
जीवन भेलनि तंग
पुरुष राम केर कारणे,
रहलनि ऊड़ल चंग
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मैथिलपन सँ युक्त छली,ओ
लव-कुश केर मैया
हमरा मनुखे सन लगली, तें
अप्पन सीता दैया
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सीता-भाषा मैथिली,
सीते सन के भाग
घ’रौ मे नै भेटि रहल,
बेटी सन अनुराग
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पतिव्रता छलि जनकक धीया,
राम कान के पातर
तइँ तऽ धोबिन अप्पन भेलनि,
दैया हमर बेमातर
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राजा होइ-ए, राजा,
मनुख न किन्नहु होइ-ए
रानी नहि,पटरानी,
हुनका की फर्क पड़ै- ए !
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जाहि सोहागिन नारि कें,
पति नै राखथि दाइ
ओहि जीवन सँ नीक जे,
पुनि धरती चल जाइ
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नारी-जीवन कानि सकै नै,
तें धर्मक लेपन देल
सीता-जीवन , नोरे तीतल,
मुदा देवि कहि देल !

(विभूति आनंद जी कें फेसबुक वाॅल सं)