लेखक नहि स्टार अधिक छै

लेखक नहि स्टार अधिक छै
रचना कम सेमिनार अधिक छै
मैथिलीक आंगन देखै छी
मुक्ति पथिक लाचार अधिक छै

साधनाक सिर चढलै साधन
लेखन थोड अधिक आराधन
मर्म न जानय धर्म न जानय
पुरस्कार बेशर्म अकानय

पोथी छोट पैघ आयोजन
रचनाकारे के लोकार्पण
ललितक अर्थ ललित बाबू छै
हालत एहिठाँ बेकाबू छै

अपना अपनी क जुटान छै
एक एक भागी महान छै
तय पहिने सँ के की बजतै
निकहा चद्दरि ककरा पडतै

रोपिते गाछ आम चाहै छै
खाली अपन नाम चाहै छै
गैंग बना क गेंग करै छै
भरला भादो बेंग बजै छै

बूझै नहि छै बुझा रहल छै
बारल दीपे मिझा रहल छै
दै अन्हार मे टोइया टापर
सभक ध्यान केवल अपना पर

ककरो लिखलाहा बोकरै छै
अपन मंच अपने छकरै छै
लाचारी के लेर चुबै छै
ब्यापारी के खूब फबै छै

पाँच पत्र दू पत्र पढल नहि
कथा प्रभासो के संबल नहि
नहि पढने छै जीवकान्त के
की कहियौ एहि मतिभ्रान्त के

श्रृजनक नहि संधान देखै छी
निर्देशक अग्यान देखै छी
पात्र अपात्रक नहि छै लेखा
एकहि हालत घर घर देखा

छी हताश जज्वात देखि क
आंगन उल्कापात देखि क
थम्हू कने बाबू उदघोषक
पार्ट टाइम नहि होइ छै लेखक

– उदय चन्द्र झा ‘विनोद’

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