हम इंसान तँ छी, मुदा इंसानियत सँ कोसों दूर

कियो ठीक्के कहने छथि—हर घरमे इंसान जन्म लैत अछि, मुदा हर दिलमे इंसानियत जन्म नहि लैत। कागज, नियम आ प्रक्रिया तऽ सभ्यता केर पहचान मानल जाइत अछि, मुदा जखन ई नियम मानवीय संवेदनाक गला घोंटए लगैत अछि, तखन सभ्यता पर प्रश्नचिह्न लगि जाइत अछि।

ओडिशाक केओंझार सँ आयल एकटा खबर एहन चोट पहुँचौलक अछि जे सुनिते आत्मा कांपि उठैत अछि। ई घटना सिर्फ एक गरीब आदिवासी भाईक विवशता नहि, बल्कि हमरा सभक सामूहिक संवेदनहीनताक दर्पण अछि।

एकटा भाई अपन मृत बहिनक कंकाल कंधा पर उठा कऽ बैंक पहुँचैत अछि।

ई दृश्य सुनबो करुण अछि। सोचू, जे भाई कखनो अपन बहिनक हाथ पकड़ि जीवनक राह पर चलने होयत, ओहि भाईकेँ ओकर अस्थिपंजर कंधा पर उठा कऽ बैंकक दरवाजापर ठाढ़ होमय पड़ल। आखिर कियैक? मात्र 19,300 रुपैया लेल। मात्र एतेक साबित करबाक लेल जे हँ, हमर बहिन आब एहि दुनियामे नहि छथि।

केओंझार जिलाक डियानाली गामक निवासी जीतू मुंडा केर बहिन कालरा मुंडा केर खाता मल्लीपासि स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंकमे छल। बहिनक दू महीना पहिने निधन भऽ गेल। पति पहिनेसँ नहि छलाह, एकमात्र संतान सेहो एहि दुनियासँ जा चुकल छल। आब जीतूए हुनकर एकमात्र जीवित संबंधी छल।

ओ बैंक गेल, आशा लऽ कऽ कि बहिनक जमा पूंजी भेटत। शायद ओहि पैसासँ किछु जरूरी जरूरत पूरा करत। मुदा बैंकक काउंटर पर संवेदनाक बदला नियमक मोट किताब खोलि देल गेल। कहल गेल—डेथ सर्टिफिकेट आनू, कानूनी वारिस प्रमाणपत्र आनू।

गरीबीमे दस्तावेज कहाँ सँ अबैत? जानकारी कहाँ सँ भेटैत? आ व्यवस्था गरीबक भाषा बुझैत कतय अछि?

जीतू खाली हाथ लौटि गेल। मुदा भीतरक विवशता एतेक गहिर छल जे ओ फेर लौटलक—एहि बेर कागज नहि, अपन मृत बहिनक कंकाल लऽ कऽ।

जखन बैंकक बाहर लोकसभ ओ दृश्य देखलनि, सभ स्तब्ध रहि गेल। ककरो आँखि नम भेल, ककरो भीतर गुस्सा उमड़ि पड़ल। प्रश्न सभक मनमे एक्के छल—की एतेक कठोर भऽ गेल अछि हमर सिस्टम जे एकटा गरीब भाईकेँ अपन बहिनक अस्थि सबूतक रूपमे देखेबाक पड़ल?

की बैंकक अधिकारी चाहितथि तँ गामक सरपंचसँ सत्यापन नहि कऽ सकैत छलाह?
की फील्ड विजिट नहि कएल जा सकैत छल?
की मानवीय आधार पर एकटा छोट निर्णय नहि लेल जा सकैत छल?

नियम जरूरी अछि, मुदा नियमक उद्देश्य इंसानक सेवा होयबाक चाही, ओकर अपमान नहि।

घटनाक सूचना पर पुलिस पहुँचल, जीतूकेँ समझौलक, भरोसा देलक जे मामला मानवीय दृष्टिकोणसँ देखल जाएत। मुदा असल सवाल एतय समाप्त नहि होइत अछि।

सवाल ई अछि जे हम एहन स्थिति आबय दैत कियैक छी?

की जीतू गलत छल?
शायद नियमक नजरिसँ हँ।

मुदा की ओकर विवशता गलत छल?
नहि। कदापि नहि।

जखन व्यवस्था गरीबक भाषा सुनब बंद कऽ दैत अछि, तखन बेबसी अपन सभसँ भयावह रूपमे बाहर अबैत अछि।

ई घटना हमरा सभक भीतर झांकबाक मौका दैत अछि। हम तकनीकमे आगाँ बढ़ि रहल छी, डिजिटल इंडिया गढ़ि रहल छी, मुदा जँ एकटा गरीब आदिवासी भाईकेँ 19 हजार रुपैयाक लेल अपन बहिनक कंकाल बैंक लऽ जाय पड़ए, तँ मानि लेबाक चाही जे प्रगतिक चमकक बीच इंसानियतक दीप बहुत धीमा भऽ गेल अछि।

हम इंसान तँ छी, मुदा शायद इंसानियतसँ कोसों दूर।

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