तीसी: मिथिला के खेत-खरिहान से जुड़ल स्वाद आ परंपरा के कहानी

दरभंगा। हरित क्रांति स’ पहिने मिथिला आ उत्तर बिहार क’ ग्रामीण जीवन मे तीसी (अलसी) के तेल के खास स्थान रहल अछि। आमतौर पर घर-घर मे नमकीन व्यंजन तीसी के तेल मे बनैत छल, जखन कि पर्व-त्योहार के समय धार्मिक कारण स’ तीसी के तेल पर रोक रहैत छल आ ओहि समय सरसों के तेल मे पकवान बनाओल जाइत छल।

ग्रामीण इलाका स’ जुड़ल लोक सभ आजो याद करैत छथि जे तीसी के तेल मे बनल उड़द के पकौड़ा के स्वाद कतबा लाजवाब होइत छल। तीसी के खेती मुख्य रूप स’ रवि मौसम मे होइत अछि, मुदा आब ई फसल किछु सीमित इलाका तक सिमटि गेल अछि। पहिले गाम-घर मे गेहूं आ मक्का के खेत के किनार-किनार तीसी के धारि लगाओल जाइत छल। जे खेत मे साल भर जल-जमाव रहैत छल, ओतहुं नवंबर-दिसंबर मे पानी घटलापर तीसी के खेती कएल जाइत छल।

तीसी के फूल अपन नीला रंग आ कोमल सुंदरता लेल प्रसिद्ध अछि। जखन तीसी के फल गोल आकार लेब’ लागैत अछि, त’ ओ बच्चा सभ लेल खेलौना बनि जाइत अछि। लट्टू जेकां गोल आ नुकीला फल के बच्चा सभ घुमा-घुमा क’ खेलैत छल—एहि खेल मे अनजाने मे फसल के नुकसान सेहो होइत छल, मुदा बचपन के ओ मासूम आनंद अलगहि छल।

अप्रैल महीना मे तीसी के फसल पकि क’ तैयार भ’ जाइत अछि। एहि स’ बनए वाला खास व्यंजन “तिसियोरी” (आंच) गाम-घर मे बहुत लोकप्रिय रहल अछि। एकर अतिरिक्त भुना तीसी के सुखा पेस्ट बना क’ चावल संग खाए के परंपरा सेहो रहल अछि, जे ग्रामीण इलाका मे दाल के विकल्प मानल जाइत अछि। सावन महीना मे भुना तीसी आ महुआ स’ बनल “लठ्ठा” सेहो खास व्यंजन मानल जाइत अछि, जे शरीर के दर्द कम करए आ स्वास्थ्य लाभ देबाक लेल प्रसिद्ध अछि।

समय के संग तीसी के तेल के उपयोग बहुत घटि गेल अछि, कियैक त’ एकर उत्पादन सेहो पहिले जेकां नहि रहल। बावजूद एकर, उत्तर बिहार के पारंपरिक किसान सभ एहि फसल के जिंदा राखने छथि।

आधुनिक समय मे तीसी “फ्लेक्स सीड” (Flaxseed) के नाम स’ बाजार मे उपलब्ध अछि, जेकरा कईटा बड़ी कंपनी सभ स्वास्थ्य उत्पाद के रूप मे पेश क’ रहल अछि। मुदा गाम-घर के स्मृति मे बसल तीसी केवल एकटा फसल नहि, बल्कि बचपन, स्वाद आ संस्कृति के अमूल्य धरोहर अछि।

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