माधवक दीया: काशीक घाट पर जरैत एक अनन्त आस्था

काशी में आइयो एक घाट एहन अछि जतय लोक जलैत अछि, आ एक घाट एहन जतय लोक जरबैत अछि। Manikarnika Ghat पर मृत्यु कहियो ठहरैत नहि, बस गुजरि जाइत अछि।

ओहि घाटक सीढ़ीक नीचाँ, जतय चिताक राख गंगाक धार में घुलि जाइत अछि, ओतहि बैसल रहैत छलाह साठि वर्षीय माधव।

माधव एकटा मोची छलाह।
लोक अबैत, जूता सिलबैत, किछु सिक्का रखि चलि जाइत। केओ कहियो हुनकर पूरा नाम नहि पूछलक। काशी में नाम सँ बेसी काज चलैत अछि।

दिन भर चमड़ा सीबैत-सीबैत हुनकर हाथ कठोर भ’ गेल छल, मुदा हृदय माटिक दीयाक लौ सन कोमल छल।

हर संझिया जखन Kashi Vishwanath Temple में शंख बजैत, घंट ध्वनित होइत, आरतीक थार सजैत, तखन माधव अपन औजार समेटैत।

ओ घाटक पत्थर पर गंगाजल छिड़कैत, एकटा छोट माटिक दीया निकालैत, सरसोंक तेल भरैत, रुईक बाती बनबैत आ सीढ़ीक सबसँ नीचाँ पायदान पर रखि दैत—एहन ठाम, जतय गंगाक लहरि ओकरा छू सकए।

ओ कोनो मंत्र नहि जनैत छलाह।
वेद नहि पढ़ने छलाह।

बस आँखि मूँदि कहैत—

“बाबा, आइयो दिन बीति गेल। अहाँक कृपासँ बीतल। ई उजास अहाँक अछि, हमर नहि।”

दीया राति भरि जरैत रहैत।
भोर होइतहि राख भ’ गंगामे विलीन भ’ जाइत।

एक आपत्ति

एक दिन मंदिरक एकटा युवा पुजारी हुनका देखलक।

ओ तमतमा उठल।
“अरे मोची! अहाँ एतय दीया किएक जरबैत छी? अहाँ मंदिरक भीतर नहि जा सकैत छी। शास्त्र मना करैत अछि। अहाँक दीया अशुद्ध अछि।”

माधव सिर झुका देलनि।

धीरे सँ कहलनि—
“महाराज, हम भीतर नहि जाइ छी। बाहरहि रखैत छी। गंगा सभकेँ धो दैत छथि। ओ केकरो मना नहि करैत छथि।”

पुजारी क्रोधित स्वर में कहलनि—
“भक्ति सेहो मर्यादासँ होइत अछि। अपन काज करू।”

दोसर दिन सँ माधव दीया आरो नीचाँ, पानीक नजदीक रखए लगलाह—जतय केकरो नजरि नहि पड़ए।

मुदा दीया जरौनाइ बंद नहि केलनि।

आँधी आ उजास

ओहि वर्ष काशी में भयंकर ज्वर फैलल। घाट पर चिताक संख्या बढ़ि गेल। मंदिरक भीड़ कम भ’ गेल। आरतीक घंटक आवाज मंद पड़ि गेल।

तखने एक राति प्रचंड आँधी आयल।

गंगा उफन पड़ली।
मंदिरक प्रांगण में जरैत पैघ-पैघ पीतलक दीप बुझि गेल। हवा एहन छल जे कपूरक लौ सेहो टिकि नहि रहल छल।

महंत चिंतित भ’ कहलनि—
“आइ महाशिवरात्रिक पूर्व संध्या अछि। गर्भगृह अन्हार में नहि रहबाक चाही।”

ओहि क्षण घाट सँ एक बालक दौड़ैत आयल—

“नीचाँ पानी में एकटा दीया जरि रहल अछि! आँधी में सेहो नहि बुझल!”

सभ दौड़ल।

सीढ़ीक सबसँ नीचाँ पायदान पर, आधा पानी में डूबल, आधा बाहर—माधवक छोट माटिक दीया स्थिर लौ संग जरि रहल छल।

लहरि ओकरा थपेड़ि रहल छल।
हवा ओकरा उड़ाबय चाहैत छल।
मुदा बाती अडिग छल—मानो अदृश्य हाथ ओकरा ढाँकि लेने हो।

माधव ओतहि बैसल छलाह। भीजल, काँपत, मुदा आँखि बंद।

महंत पूछलनि—
“ई केना सम्भव भेल?”

माधव मुस्कियाइत कहलनि—

“हम नहि जरौलहुँ बाबा। रोजक जेकाँ तेल देलहुँ आ कहलहुँ—आइ बहुत अन्हार अछि, अहाँ सम्हारि लिअ। आब ओहि सभ सम्हारि रहल छथि।”

पुजारी मौन भ’ गेलाह।

शास्त्रक अनुसार बहुत किछु अशुद्ध छल।
मुदा प्रकाश तऽ छल।

रातिक दर्शन

ओहि राति माधवक शरीर ज्वर सँ तपए लगल।
ओ अपन झोपड़ी में पड़ल रहलाह। दीया जराबय नहि जा सकलाह।

आधी राति हुनका अनुभव भेल—केओ माथ पर शीतल हाथ फेरि रहल अछि।

आँखि खोललनि।

झोपड़ी धुंधल उजास सँ भरल छल।

सामने एक जटाधारी पुरुष ठाढ़ छलाह।
शरीर पर भस्म।
गला में मणिकर्णिकाक राखक आभा।

माधव उठए चाहलनि, मुदा शरीर साथ नहि देलक।

आगंतुक हँसि कहलनि—

“उठू नहि। अहाँ साठि बरख धरि हमर लेल दीया जरौलहुँ। आइ हम अहाँ लेल आयल छी।”

माधवक आँखिसँ नोर बह’ पड़ल।

“अहाँ के? हम तऽ नीच छी। अपात्र छी। पंडित कहैत छथि हमर छूअल जल सेहो मंदिर में नहि चढ़ैत।”

ओ मुस्कुरेलाह।

ओ स्वयं Shiva छलाह।

हुनका माधवक फाटल चमड़क झोला उठेलनि, जाहिमे औजार रखल रहैत छल।

कहलनि—

“जिन हाथ सँ अहाँ थाकल तीर्थयात्रीक जूता सीलहुँ, जाहिसँ ओ हमर दर्शन लेल चलि सकल, ओ हाथ अपवित्र केना भेल?

जिन दीया में अहाँ अपन भोजनक तेलक आधा हिस्सा द’ देलहुँ, ओतय लोभ कतय रहल?”

“माधव, सनातन धर्म कोनो दीवार नहि, जे रोकैत हो। ई तऽ धारा अछि, जे बहबैत अछि।

वेद कहैत अछि—‘सत्यं वद, धर्मं चर।’

अहाँ सत्य कहलहुँ। धर्म पर चललहुँ।
कखनो झूठ नहि कहलहुँ।
कखनो अधिक दाम नहि लेलहुँ।
कखनो दीया नागा नहि केलहुँ।

ईए हमर अभिषेक अछि।”

“पंडित मंत्र सँ हमरा जगबैत छथि।
अहाँ प्रेम सँ जगबैत छी।

मंत्र खसि सकैत अछि, प्रेम नहि।”

एतबा कहि ओ माधवक माथ पर भस्म लगा देलनि।

भोरक शांति

भोर में लोक आयल।

माधव शांत पड़ल छलाह।
चेहरापर एहन शांति छल, जे केवल स्नान कएल साधुक मुख पर देखाइत अछि।

झोपड़ी में कोनो पैघ दीप नहि छल।
कोनो शंख नहि।

बस एकटा छोट माटिक दीया छल—बुझल।

मुदा ओकर बातीसँ आइयो सुगंध आबि रहल छल।

एक परंपराक जन्म

ओहि दिन महंत नियम बदलि देलनि।

घोषणा कएलनि—

“आइ सँ मणिकर्णिका पर जे केओ दीया जराओत, ओ विश्वनाथक मानल जायत।
न जाति पूछल जायत।
न गोत्र।”

आइयो संध्या समय, जखन काशी में आरती होइत अछि, पैघ-पैघ दीपकक बीच सीढ़ीक सबसँ नीचाँ एकटा छोट माटिक दीया अवश्य जरैत अछि।

पुजारी ओकरा “माधवक दीया” कहैत छथि।

तीर्थयात्री पूछैत छथि—किएक?

बुजुर्ग बतबैत छथि—

“सनातनक अर्थ पुरान नहि, शाश्वत अछि।
शाश्वत ओ नहि जे पत्थर पर लिखल अछि।
शाश्वत ओ अछि जे हृदय में जरैत अछि।”

माधव कोनो शास्त्र नहि लिखलनि।
कोनो संप्रदाय नहि चलौलनि।

बस एतेक सिखा गेलाह—

भगवान केँ अहाँक शुद्ध घी सँ बेसी अहाँक शुद्ध नीयत चाही।

आ जखन नीयत शुद्ध हो, तखन आँधी सेहो अहाँक दीया नहि बुझा सकैत अछि।

किएक तँ तखन ओकरा अहाँ नहि—
स्वयं बाबा विश्वनाथ जरबैत छथि।

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