
सृष्टि झा
भारतक सभ्यता केवल प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक स्मारक आ धार्मिक परंपरामे मात्र जीवित नहि अछि, बल्कि ओहि विचार, दर्शन आ ज्ञानक धरोहर में सेहो संरक्षित अछि, जे सदियेसँ मानव जीवनकेँ दिशा देखबैत रहल अछि। भारतीय संस्कृति अपन एहि विशेषताक लेल जानल जाइत अछि जे एतय ज्ञानकेँ कोनो एकटा काल, भाषा, क्षेत्र अथवा समुदाय तक सीमित नहि मानल गेल। मानव जीवनक अनुभवसँ उपजल विचारकेँ संपूर्ण मानवताक साझा धरोहर मानल गेल अछि। तमिल भाषाक महान संत-कवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित तिरुक्कुरल एहि समृद्ध बौद्धिक आ सांस्कृतिक परंपराक अनुपम उदाहरण अछि।
काशी आ तमिलनाडुक बीच सदियों पुरान सांस्कृतिक संबंधकेँ आओर मजबूत करबाक उद्देश्यसँ काशी तमिल संगमम 5.0 केर शुरुआत भ’ गेल अछि। एहि आयोजनक कर्टेन रेजर कार्यक्रम आईआईटी मद्रास में आयोजित भेल। एहि वर्ष संगममक विषय ‘तिरुक्कुरल पयिलोम’ अर्थात् ‘आउ, तिरुक्कुरल सीखू’ राखल गेल अछि। एहि संस्करणक मुख्य उद्देश्य तमिल भाषाक महान ग्रंथ तिरुक्कुरल में समाहित शाश्वत ज्ञान, नैतिक मूल्य आ जीवन दर्शनकेँ व्यापक जनसमुदाय धरि पहुंचेनाइ अछि। एकर माध्यमसँ भारतीय ज्ञान परंपरा आ तमिल साहित्यक समृद्ध विरासतकेँ नव पीढ़ीसँ जोड़बाक प्रयास कयल जा रहल अछि।
काशी तमिल संगमम काशी आ तमिलनाडुक बीच ऐतिहासिक, आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक संबंधकेँ मजबूत करबाक महत्वपूर्ण माध्यम बनल अछि। पांचम संस्करण में तिरुक्कुरलकेँ केंद्र में रखैत एहि सांस्कृतिक विरासतकेँ राष्ट्रीय स्तर पर नव पहचान देबाक आ दुनू क्षेत्रक बीच आत्मीय संबंधकेँ आओर गहीर करबाक लक्ष्य राखल गेल अछि।
करीब दू हजार वर्ष पुरान तमिल साहित्यिक परंपरासँ जुड़ल तिरुक्कुरल मात्र साहित्यिक ग्रंथ नहि, बल्कि जीवन जीबाक कला, सामाजिक जिम्मेदारी, नैतिक आचरण आ सुशासनक व्यापक दर्शन अछि। एकर 1,330 संक्षिप्त काव्य रचनामे मानव जीवनसँ जुड़ल एहन गूढ़ सत्य समाहित अछि, जे आधुनिक समाज आ वैश्विक व्यवस्थाक लेल सेहो ओतबे प्रासंगिक अछि, जतेक अपन रचनाकाल में छल।
तिरुक्कुरलक सभसँ पैघ विशेषता एकर सार्वभौमिकता अछि। एहि ग्रंथ में कोनो खास धर्म, जाति, संप्रदाय अथवा क्षेत्र विशेषक लेल संदेश नहि देल गेल अछि। एकर विचार मनुष्यकेँ ओकर कर्म, व्यवहार, कर्तव्य आ सामाजिक उत्तरदायित्वक आधार पर परखैत अछि। एहि कारण ई ग्रंथ भारतक सीमा पार क’ दुनिया भरिक अनेक देश आ भाषामे पहुंचल अछि।
तीन खंड में समाहित संपूर्ण जीवन दर्शन
तिरुक्कुरलकेँ मुख्य रूपसँ तीन भाग में बांटल गेल अछि—अरम (धर्म आ सदाचार), पोरुल (अर्थ, शासन आ सामाजिक व्यवस्था) आ इनबम (प्रेम आ पारिवारिक जीवन)। एहि ग्रंथ में 133 अध्याय अछि आ प्रत्येक अध्याय में दस-दस कुरल देल गेल अछि। एहि प्रकार कुल 1,330 द्विपंक्तिय रचनामे जीवनक विभिन्न पक्षक अत्यंत संक्षिप्त, मुदा प्रभावशाली विवेचन कयल गेल अछि।
पहिल भाग मनुष्यकेँ नैतिकता, सत्य, करुणा, विनम्रता आ आत्मसंयमक महत्व बुझबैत अछि। एहिमे कहल गेल अछि जे कोनो व्यक्तिक वास्तविक महानता ओकर धन, पद अथवा प्रतिष्ठासँ नहि, बल्कि ओकर चरित्र आ आचरणसँ निर्धारित होइत अछि।
दोसर भाग राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, न्याय, नेतृत्व आ राज्य संचालन जेहेन विषय पर केंद्रित अछि। एहिमे आदर्श शासकक गुण, मंत्रिमंडलक जिम्मेदारी, न्यायपूर्ण शासन आ जनकल्याणकेँ विशेष महत्व देल गेल अछि। तेसर भाग प्रेम, दांपत्य संबंध आ मानवीय भावनाक कोमल अभिव्यक्ति करैत अछि।
एहि तरहें तिरुक्कुरल व्यक्ति, परिवार, समाज आ राष्ट्रक बीच संतुलित आ आदर्श व्यवस्था स्थापित करबाक दर्शन प्रस्तुत करैत अछि।
सुशासन आ नैतिक नेतृत्वक प्राचीन मार्गदर्शन
आइ जखन पूरा दुनिया पारदर्शी प्रशासन, जवाबदेह नेतृत्व, भ्रष्टाचारमुक्त व्यवस्था आ नागरिक कल्याणक चर्चा क’ रहल अछि, तखन तिरुक्कुरलक विचार विशेष महत्व रखैत अछि। ई ग्रंथ शासक लेल न्याय, विवेक, निष्पक्षता आ जनकल्याणकेँ अनिवार्य गुण मानैत अछि।
तिरुवल्लुवरक शासन संबंधी चिंतन एहि बात पर जोर दैत अछि जे सत्ताक उद्देश्य केवल अधिकारक उपयोग करब नहि, बल्कि जनताक सुरक्षा, समृद्धि आ सम्मान सुनिश्चित करब होयबाक चाही। एकटा आदर्श शासककेँ निर्णय लैत समय व्यक्तिगत स्वार्थसँ ऊपर उठि व्यापक जनहितकेँ प्राथमिकता देबाक चाही।
आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थामे सेहो ई विचार प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि आ नीतिनिर्माताक लेल महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करैत अछि। कोनो शासन व्यवस्थाक सफलता केवल आर्थिक उपलब्धिसँ नहि, बल्कि एहि आधार पर सेहो मापल जेबाक चाही जे समाजक अंतिम व्यक्तितक न्याय, अवसर आ सम्मान पहुंचि रहल अछि वा नहि।
मानवीय संवेदना आ सामाजिक समरसताक संदेश
तिरुक्कुरलक एकटा आओर महत्वपूर्ण विशेषता एकर मानवीय संवेदना अछि। एहि ग्रंथ में अहिंसा, करुणा, दया, परोपकार, अतिथि सत्कार आ दोसराक प्रति सम्मानकेँ जीवनक अनिवार्य मूल्य मानल गेल अछि।
ग्रंथक मूल संदेश अछि जे मनुष्यक श्रेष्ठता ओकर व्यवहार में देखाइत अछि। दोसराकेँ कष्ट पहुंचा क’ प्राप्त कयल सफलता वास्तविक सफलता नहि भ’ सकैत अछि। समाज में शांति आ सद्भाव तखने स्थापित भ’ सकैत अछि, जखन व्यक्ति अपन अधिकारक संग दोसराक अधिकार आ भावनाक सेहो सम्मान करय।
वर्तमान समय में जखन दुनिया युद्ध, हिंसा, सामाजिक तनाव, पर्यावरणीय संकट आ नैतिक चुनौतीसँ जूझि रहल अछि, तखन तिरुक्कुरलक शिक्षा मानवताकेँ सह-अस्तित्व आ जिम्मेदार जीवनक बाट देखबैत अछि।
भारतीय ज्ञान परंपराक वैश्विक पहचान
तिरुक्कुरलक लोकप्रियताक एकटा महत्वपूर्ण कारण एकर विभिन्न भाषामे अनुवाद होयब अछि। एहि ग्रंथक अनेक भारतीय आ विदेशी भाषामे अनुवाद भ’ चुकल अछि। एकर माध्यमसँ तमिल साहित्य आ भारतीय चिंतनकेँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भेटल अछि।
महत्वपूर्ण बात ई अछि जे तिरुक्कुरलक प्रभाव कोनो एकटा भाषायी समुदाय तक सीमित नहि रहल। अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमिक लोकसभ एहि में निहित नैतिक आ मानवीय विचारकेँ बुझबाक आ अपन सामाजिक जीवनसँ जोड़बाक प्रयास कयलनि।
भारतक सांस्कृतिक विविधतामे तमिल भाषा आ साहित्यक विशेष स्थान अछि। तिरुवल्लुवरक रचना एहि बातक प्रमाण अछि जे भारतीय ज्ञान परंपरा में क्षेत्रीय भाषासभ सेहो विश्वकेँ समृद्ध विचार देलक अछि। संस्कृत, तमिल, पाली, प्राकृत आ अन्य भारतीय भाषामे विकसित साहित्यिक आ दार्शनिक परंपरासभ मिलि भारतक बहुआयामी सांस्कृतिक पहिचानकेँ मजबूत करैत अछि।
नव पीढ़ीक लेल सेहो प्रासंगिक अछि तिरुक्कुरल
आइ युवा पीढ़ी तकनीक, प्रतिस्पर्धा आ तेजी सँ बदलैत जीवनशैलीक दौरसँ गुजरि रहल अछि। डिजिटल दुनियासँ अवसरक विस्तार भेल अछि, मुदा एकरा संग तनाव, नैतिक दुविधा आ सामाजिक जिम्मेदारीसँ जुड़ल चुनौती सेहो बढ़ल अछि। एहन समय में तिरुक्कुरलक शिक्षा युवासभकेँ चरित्र निर्माण, अनुशासन, परिश्रम, विनम्रता आ विवेकपूर्ण निर्णय लेबाक प्रेरणा द’ सकैत अछि।
शिक्षाक उद्देश्य केवल रोजगार पेनाइ अथवा आर्थिक रूपसँ सफल होयब नहि अछि। एकर महत्वपूर्ण पक्ष जिम्मेदार नागरिक आ संवेदनशील मनुष्यक निर्माण सेहो अछि। तिरुक्कुरल एहि व्यापक शिक्षाक संदेश दैत अछि।
एहि ग्रंथक विशेषता अछि जे ई पैघ-पैघ दार्शनिक विचारकेँ अत्यंत सरल आ संक्षिप्त शब्द में प्रस्तुत करैत अछि। एकर दू पंक्ति पाठककेँ जीवनक महत्वपूर्ण प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक विचार करबाक लेल प्रेरित क’ सकैत अछि।
विरासतसँ विश्व कल्याण धरि
तिरुक्कुरल भारतीय सभ्यताक ओहि उदार विचारधाराक प्रतिनिधित्व करैत अछि, जाहिमे ज्ञानक उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहि, बल्कि संपूर्ण मानव समाजक कल्याण अछि। ई हमरा सभकेँ स्मरण करबैत अछि जे विकासक वास्तविक कसौटी आर्थिक संपन्नताक संग नैतिक समृद्धि सेहो अछि।
तिरुवल्लुवर अपन शब्दक माध्यमसँ जाहि आदर्श समाजक कल्पना कयलनि, ताहिमे न्यायपूर्ण शासन, नैतिक नागरिक, संवेदनशील परिवार आ पारस्परिक सम्मान पर आधारित सामाजिक व्यवस्थाकेँ महत्व देल गेल अछि।
आइ आवश्यकता एहि बातक अछि जे तिरुक्कुरल सन कालजयी ग्रंथकेँ केवल साहित्यिक धरोहरक रूप में संरक्षित नहि राखल जाय, बल्कि एकर विचारकेँ शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक संवाद आ दैनिक जीवनक हिस्सा बनाओल जाय।
करीब दू हजार वर्ष पूर्व रचल ई ज्ञान-संपदा आइयो एहि बातक संदेश दैत अछि जे कोनो सभ्यताक वास्तविक पहचान ओकर भौतिक उपलब्धिसँ बेसी ओकर नैतिक मूल्य में निहित होइत अछि। तिरुक्कुरल भारतीय ज्ञान परंपराक एहन अमूल्य रत्न अछि, जकर प्रासंगिकता समयक संग कम होयबाक बदला निरंतर व्यापक होइत जा रहल अछि। ई केवल तमिल साहित्यक गौरव नहि, बल्कि संपूर्ण मानवताक लेल ज्ञान, नैतिकता आ सद्भावक शाश्वत संदेशवाहक अछि।