Naxalism – युद्धक्षेत्र सँ आगाँ: नक्सलवादक विचारधारा पर निर्णायक प्रहार

भारतक तथाकथित “रेड कॉरिडोर” केर घना जंगलमे सुरक्षा बल नें सशस्त्र नक्सली सभ पर निर्णायक जीत हासिल कय लेल अछि। एक समय हजारों संख्या मे सक्रिय आ दुर्गम इलाका मे मजबूत पकड़ बना कए बैठल नक्सली आब लगभग समाप्ति कगार पर पहुँचि गेल अछि। सुरक्षाकर्मी सभक साहस, धैर्य आ लगातार प्रयास सँ हुनकर ठिकाना पर कब्जा भऽ गेल अछि आ हथियार खामोश भऽ गेल अछि। एहि उपलब्धि के सराहना करैत केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah स्पष्ट चेतावनी देलनि जे ई लड़ाई एखन समाप्त नहि भेल अछि।

असल चुनौती आब ओ अदृश्य मोर्चा अछि, जतऽ विचारक लड़ाई चलि रहल अछि। नक्सलवादक जहरीला विचार एखनहुं शहरी नेटवर्क, बौद्धिक वर्ग आ किछु संगठन मे अपन जगह बनबय के कोशिश कऽ रहल अछि। ई विचारधारा भारतीय संविधान के नकारैत अछि, लोकतंत्र के कमजोर करैत अछि आ हिंसा के महिमामंडित करैत अछि। लोकसभा मे चर्चा दौरान अमित शाह साफ कहलनि जे जतऽ-जहाँ नक्सलवादक विचारधारा पहुँचल, ओतऽ हिंसा अनिवार्य रूप सँ जुड़ि गेल—ईहे “अर्बन नक्सल” केर असल रूप अछि।

शहरी नेटवर्क आ “अर्बन नक्सल” पर सख्ती

“अर्बन नक्सल” शब्द ओहि विचारक, संगठन आ किछु एनजीओ लेल उपयोग कयल जाइत अछि, जे शहर मे रहि कए कानूनी सहायता, सहानुभूतिपूर्ण मीडिया नैरेटिव आ कतेको बेर गुप्त फंडिंग द्वारा ई विचारधारा के बढ़ावा दैत अछि। ई लोक केवल समर्थक नहि, बल्कि राष्ट्र-विरोधी गतिविधि मे संलिप्त मानल जाइत छथि।

2019 मे गृह मंत्रालयक जिम्मेदारी संभाललाक बाद अमित शाह एहि नेटवर्क पर सख्ती शुरू केलनि। Bhima Koregaon case जेकाँ मामला सभ मे तथाकथित बुद्धिजीवी आ नक्सली नेटवर्कक संबंध सामने आयल। विदेशी फंडिंग पर कड़ा नियंत्रण आ आतंकी फंडिंग जांच सँ सरकारक स्पष्ट संदेश देल गेल—कानून सँ ऊपर केओ नहि।

“जनताना सरकार” आ डरक शासन

भारत मे नक्सलवाद अपन शुरुआत सँ लोकतांत्रिक व्यवस्था के चुनौती दैत रहल अछि। नक्सली सभ केवल हथियार नहि उठेलक, बल्कि संविधान के जलाबय आ “जनताना सरकार” जेकाँ समानांतर शासन व्यवस्था खड़ा करबाक प्रयास केलक। गांव मे “जन अदालत” चला कए डर आ आतंक के माहौल बनायल गेल, जतऽ असहमति राखय वाला के “सरकारी मुखबिर” कहि कए मारि देल जाइत छल।

बौद्धिक वर्ग पर उठैत सवाल

एहि स्थिति सँ एकटा गंभीर प्रश्न उठैत अछि—बौद्धिक वर्गक सहानुभूति आखिर केकरा लेल अछि? जखन नक्सली हिंसा चरम पर छल, तखन आदिवासी समाज सभसँ बेसी पीड़ित भेल—हत्या, शोषण आ विकास रुकि गेल। मुदा की हुनका लेल अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवाधिकारक आवाज उठल?

की बस्तरक निर्दोष लोक, जे बारूदी सुरंग मे मायल गेल, ओहिना मानवाधिकार सँ वंचित छल? स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराबय वाला स्कूल प्रधानाचार्यक हत्या पर की कखनो कैंडल मार्च भेल? बरखा भरि किछु मंच नक्सली हिंसा के “क्रांति” आ “सामाजिक न्याय” कहि कए महिमामंडित करैत रहल। मुदा की खून-खराबा सँ न्याय संभव अछि?

दोहरापन पर सरकारक सख्त रुख

जखन सरकार निर्णायक कार्रवाई कऽ रहल अछि, तखन “मानवाधिकार” केर आवाज चुनिंदा रूप सँ उठैत अछि। एहि दोहरे मापदंड पर अमित शाह सवाल उठेलनि—“जे बौद्धिक वर्ग सरकार के सलाह दैत छथि, ओ आदिवासी सभक पीड़ा पर कियैक नहि लिखैत छथि? हुनकर सहानुभूति एतेक चयनात्मक कियैक अछि?”

आब विचारक लड़ाई जरूरी

नक्सलवाद पर अंतिम जीत केवल बंदूक सँ संभव नहि अछि। आब लड़ाई विचारक स्तर पर लड़बाक जरूरत अछि। सरकार शिक्षा, जागरूकता आ सही नैरेटिव पर जोर देत अछि। विश्वविद्यालय सभ मे नक्सलवादक असफलता पर चर्चा, डिजिटल अभियान द्वारा आदिवासी युवा के सशक्त बनाबय आ गलत जानकारी के तथ्य सँ जवाब देब—ई सभ जरूरी कदम अछि।

कानूनी स्तर पर सेहो कार्रवाई जारी अछि—यूएपीए तहत सख्ती, एनजीओ निगरानी आ शहरी नेटवर्क पर प्रहार कएल जा रहल अछि।

इतिहास सँ सीख: Salwa Judum

चर्चा दौरान गृह मंत्री सलवा जुडूम आंदोलनक सेहो जिक्र केलनि। 2005 मे शुरू भेल ई जनआंदोलन नक्सल हिंसा के खिलाफ छल, जकर नेतृत्व महेंद्र कर्मा केने छलथि। आदिवासी युवा के विशेष पुलिस अधिकारी बना कए लड़ाई मजबूत कएल गेल। मुदा 2011 मे सुप्रीम कोर्टक निर्णय के बाद ई पहल बंद कएल गेल, जकर बाद नक्सली सभ एहि संग जुड़ल लोक पर हमला शुरू कए देलक।

निर्णायक मोड़ पर भारत

भारत आब एकटा निर्णायक मोड़ पर ठाढ़ अछि। सशस्त्र नक्सलवाद पर काफी हद तक नियंत्रण पा लेल गेल अछि, मुदा ओकर विचारधारा के जड़ि सँ खत्म करब एखन बाकी अछि। जागरूकता, सख्त कानून आ वैचारिक संघर्ष द्वारा भारत एकटा शांतिपूर्ण आ हिंसा-मुक्त भविष्य सुनिश्चित कऽ सकैत अछि।

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