कूड़ाक पहाड़ सँ कमाइ केर बाट: कोना ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल बदलि सकैत अछि दिल्लीक भविष्य

नई दिल्ली। दिल्लीक पहचान बरखों सँ देशक राजधानी, राजनीतिक शक्ति केंद्र आ आर्थिक गतिविधिक प्रमुख केंद्रक रूपमे रहल अछि। मुदा पछिला किछु वर्षमे राजधानीक एकटा आन पहचान सेहो उभरि कऽ सामने आएल अछि—कचड़ाक विशाल पहाड़। गाजीपुर, भलस्वा आ ओखला केर लैंडफिल साइट सभ केवल पर्यावरणीय संकटक प्रतीक नहि अछि, बल्कि ई सभ एहि बातक याद सेहो करबैत अछि जे शहरी विकासक संग अपशिष्ट प्रबंधनक चुनौती कतबा तेजी सँ बढ़ि रहल अछि।

मुदा आब एहि समस्याकें नव दृष्टिकोण सँ देखबाक प्रयास शुरू भऽ गेल अछि। जँ हालहि मे नाबार्डक क्षेत्रीय सलाहकार समिति (RAC) केर बैठकमे निकलल निष्कर्ष सभ धरातल पर उतारल जाए, तँ आबय बला वर्ष सभमे दिल्ली कचड़ाकें बोझ नहि, बल्कि आर्थिक संसाधनक रूपमे देखय बला देशक अग्रणी राजधानी बनि सकैत अछि।

जखन कचड़ा समस्या नहि, अवसर बनि जाए

12 जून 2026 केँ आयोजित एहि महत्वपूर्ण बैठकक विषय छल—“स्मार्ट आ सतत दिल्ली लेल नवाचार, स्थिरता आ कौशल: कचड़ासँ संपदा आधारित उद्यम”।

बैठकमे सहभागी विशेषज्ञ, नीति निर्माता, बैंकिंग क्षेत्रक प्रतिनिधि, वैज्ञानिक आ विकास संस्थानक अधिकारी सभ एक स्वरमे कहलनि जे आब समय आबि गेल अछि जे कचड़ाकें केवल निपटानक समस्या नहि, बल्कि आर्थिक परिसंपत्तिक रूपमे देखल जाए।

दिल्लीमे प्रतिदिन लगभग 11,862 टन ठोस कचड़ा उत्पन्न होइत अछि। ई आंकड़ा अपने आपमे चुनौतीपूर्ण अछि, मुदा एहि सँ बेसी महत्वपूर्ण बात ई अछि जे एहि कचड़ाक एकटा पैघ हिस्सा पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग), पुनः उपयोग आ ऊर्जा उत्पादन लेल प्रयोग कएल जा सकैत अछि।

विशेषज्ञ सभक अनुसार राजधानीमे उत्पन्न होमय बला लगभग 80 प्रतिशत कचड़ामे आर्थिक मूल्य छिपल अछि, जकरा उचित तकनीक, वित्तीय सहयोग आ प्रबंधनक माध्यम सँ संपदामे बदलल जा सकैत अछि।

कचड़ामे नुकायल अछि अर्थव्यवस्था

कल्पना करू जे मंदिरमे प्रतिदिन चढ़ाओल जाए बला फूल अगरबत्ती, जैविक खाद आ प्राकृतिक रंगमे बदलि जाए। पुरान कपड़ा बैग, दरी आ हस्तशिल्प उत्पादक रूप धारण कऽ ले। प्लास्टिक आ ई-वेस्ट सँ फेर उपयोग योग्य उत्पाद तैयार हो। जैविक कचड़ा सँ बायो-सीएनजी आ बिजलीक उत्पादन हो।

ई केवल कल्पना नहि, बल्कि उभरैत “सर्कुलर इकोनॉमी” केर मॉडल अछि, जाहिमे कोनो संसाधनकें अंतिम कचड़ा नहि मानल जाइत अछि, बल्कि ओकरा फेर सँ आर्थिक चक्रमे शामिल कएल जाइत अछि।

नाबार्डक मुख्य महाप्रबंधक नवीन कुमार राय एहि सोचकेँ आगाँ बढ़बैत कचड़ा प्रबंधनमे वैल्यू-चेन आधारित दृष्टिकोण अपनय पर जोर देलनि। हुनकर मानब अछि जे ई-वेस्ट, प्लास्टिक, निर्माण अपशिष्ट, बागवानी कचड़ा आ बाजारक अपशिष्टकेँ अलग-अलग श्रेणीमे विभाजित कऽ वैज्ञानिक ढंग सँ प्रसंस्करण कएल जाए तँ ई क्षेत्र हजारों नव रोजगार उत्पन्न कऽ सकैत अछि।

विज्ञान आ नवाचारक बढ़ैत महत्व

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालयक स्ट्रैटेजिक एलायंस निदेशक डॉ. सपना पोती बैठकमे एकटा महत्वपूर्ण सवाल उठौलनि—जखन देशमे तकनीक उपलब्ध अछि, स्टार्टअप सक्रिय छथि आ शोध संस्थान लगातार नवाचार कऽ रहल छथि, तँ फेर एहि तकनीक सभक व्यापक उपयोग किएक नहि भऽ रहल अछि?

हुनकर कहब छल जे समस्या तकनीकक उपलब्धतामे नहि, बल्कि ओकर प्रसार आ उपयोगमे अछि।

एहि उद्देश्य सँ “मंथन”, “उत्थान”, “स्मार्ट विलेज सेंटर” आ “सक्षम” जेकाँ कार्यक्रम चलाओल जा रहल अछि, जे उद्योग, शोध संस्थान आ स्थानीय समुदायक बीच पुलक काज कऽ रहल अछि। एहि पहल सभक लक्ष्य प्रयोगशालामे विकसित नवाचारकेँ समाज आ बाजार धरि पहुँचेनाइ अछि।

आयात निर्भरता घटेबाक अवसर

दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्सक निदेशक प्रो. राम सिंह एहि चर्चाकें व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्यमे रखलनि। हुनकर अनुसार भारत अनेक महत्वपूर्ण खनिज आ संसाधन लेल आयात पर निर्भर अछि। एहन स्थितिमे ई-वेस्ट, प्लास्टिक आ बैटरी सँ मूल्यवान धातु आ संसाधनक पुनर्प्राप्ति देशक आर्थिक आत्मनिर्भरता मजबूत कऽ सकैत अछि।

आइ जकरा इलेक्ट्रॉनिक कचड़ा मानल जाइत अछि, ओकरामे तांबा, एल्युमिनियम, लिथियम सहित अनेक बहुमूल्य तत्व मौजूद रहैत अछि। जँ एहि संसाधन सभक व्यवस्थित पुनर्प्राप्ति कएल जाए तँ ई एकटा पैघ औद्योगिक अवसरमे बदलि सकैत अछि।

हरित रोजगारक नव मॉडल

बैठकमे बार-बार एहि बात पर जोर देल गेल जे कचड़ा प्रबंधन केवल पर्यावरणीय कार्यक्रम नहि, बल्कि रोजगार आ उद्यमिताक एकटा पैघ माध्यम सेहो बनि सकैत अछि।

विशेष रूप सँ स्वयं सहायता समूह (SHGs), स्टार्टअप्स आ सामाजिक उद्यम लेल एहि क्षेत्रमे अपार संभावना मौजूद अछि। महिला, युवा आ लघु उद्यमी स्थानीय स्तर पर कचड़ा सँ मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कऽ आयक नव स्रोत विकसित कऽ सकैत छथि।

जँ वित्तीय संस्थान, स्थानीय निकाय आ तकनीकी संस्थान मिलिकऽ काज करथि तँ “वेस्ट टू वेल्थ” मॉडल लाखों लोकक आजीविकासँ जुड़ि सकैत अछि।

सफलताक कुंजी: साझेदारी

बैठकक एकटा महत्वपूर्ण निष्कर्ष ई सेहो रहल जे केवल सरकार एहि चुनौतीक समाधान नहि कऽ सकैत अछि। एकरा लेल नगर निगम, बैंक, शोध संस्थान, निजी क्षेत्र आ नागरिक समाजक बीच मजबूत साझेदारी आवश्यक अछि।

नगर निगम सभकें बेहतर आधारभूत संरचना विकसित करय पड़त, बैंक सभकें वित्तीय सहायता उपलब्ध कराबय पड़त आ तकनीकी संस्थान सभकें व्यवहारिक समाधान तैयार करय पड़त। ओतहि नागरिक सभकें स्रोत स्तर पर कचड़ाक पृथक्करणक आदत अपनाबय पड़त।

दिल्ली लेल नव सोचक समय

दिल्ली बरखों सँ बढ़ैत कचड़ा संकट सँ जूझि रहल अछि। मुदा संकटमे अवसर खोजब विकासक मूल मंत्र मानल जाइत अछि। नाबार्डक एहि पहल सँ संकेत भेटल अछि जे जँ सही रणनीति, आधुनिक तकनीक आ वित्तीय सहयोग उपलब्ध हो, तँ कचड़ाक पहाड़ आर्थिक समृद्धिक केंद्र बनि सकैत अछि।

आब चुनौती केवल योजना बनेबाक नहि, बल्कि ओकर सफल क्रियान्वयनक अछि। जँ “वेस्ट टू वेल्थ” मॉडल सफल होइत अछि, तँ दिल्ली केवल स्वच्छ आ हरित राजधानी नहि बनत, बल्कि देश लेल सतत विकास आ सर्कुलर इकोनॉमीक प्रेरणादायक मॉडल सेहो बनि सकैत अछि।

कचड़ाक ढेर सँ निकलैत ई नव कहानी केवल पर्यावरण सुधारक नहि, बल्कि रोजगार, नवाचार, उद्यमिता आ आत्मनिर्भरताक कहानी सेहो बनि सकैत अछि।

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