– डाॅ शंकरदेव झा
आइ-काल्हि बहुतो दुर्लभ प्रजातिक कवि नामधारी जीव सबकें सिरीजमे कविता लिखैत देखैत छिअनि। देखैत की छिअनि कविताक टाल लगबैत देखि रहल छिअनि आ अपन ओहि सिरीजक कविताकें लऽ कऽ महाकविक आसनपर बैसल, समाजमे बाँहि टेढ़ कऽ कऽ चलैत देखैत छिअनि, कवि-सम्मेलनक मंचपर वीरासन लगौने देखैत छिअनि, साक्षात समीक्षासँ लऽ कऽ अपन वेब समीक्षा करबैत देखैत छिअनि, पाग डोपटा आ माला पबैत देखैत छिअनि; रहिका, बेनीपट्टी, पटना, कोलकाता,राँची, हैदराबाद आदिसँ सम्मान-पुरस्कार पबैत देखैत छिअनि तँ हमरो सेहन्ता जागल जे किएक ने हमहूँ सिरीजमे कविता लिखि राता-राती प्रसिद्धि पाबी।
अपन एहि अदम्य पिपासाक शमन हेतु ओहि सिरीजदार कवि लोकनिक कविता बहार कयलहुं। देखैत अछि नगर आधारित सिरीज कविताक बाढ़ि अछि । केओ दरभंगा पर तं केओ काशी पर; केओ सहरसा पर तं केओ प्रयागराज पर; केओ मधुबनी पर तं केओ दिल्ली पर! एहि कविता सबकें पढ़लहुं तं मन पड़ऽ लागल तिसरा-चौथाक ओ लेख सब, जेना स्कूलमे गुरूजी कहैत छलथिन जे अपन विद्यालयपर, अपन गामपर, अपन गामक खेत-पथारपर लेख लिख कऽ ला आ हमरा लोकनि से लिखि कऽ लइयो जाइत रही। जेना हम अपन गाम कबिलपुरपर एकटा लेख लिखने रही तकर किछु अंशक स्मरण भऽ रहल अछि- हमर गामक नाम कबिलपुर अछि / हमरा गाममे चारिटा टोल अछि /हमरा गाममे चारिटा पोखरि अछि /हमरा गाममे चारिटा मन्दिर अछि /हमरा गाममे एकटा स्कूल अछि••••••आदि आदि।
नगरपर सिरीजमे कविता लिखनिहार महाकवि लोकनिक कवितामे हमर ओहि तिसरा-चौथाक लेख सन सहजता ओ सरलता देखि हमरो ई साहस भेल जे हमहूं कोनो नगरपर पचीस-पचासटा कविता लिखि सकैत छी। जेना एकटा महाकवि अपन दरभंगा सिरीजक कविता सबमे हराही, दिग्घी, गंगासागर, श्यामा मन्दिर, दुनू विश्वविद्यालय, दुनू संग्रहालय,दरभंगा राज, आयकर चौराहा आदिक वर्णन कयने छथि तं काशी पर सिरीजमे कविता लिखनिहार काशी विश्वनाथ, गंगाक घाट, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, गोदौलिया चौक आदिक वर्णन अनेकानेक कवितामे ओही सरलता आ सहजताक संग कयने छथि ।
हमहूँ नगरपर सिरीजमे कविता लिखि राता-राती महाकविक आसनपर छड़पि कऽ बैसि जाइ, मुदा समस्या तं ई जे हम भेलहुं इनारक बेङ, बेसी शहर तं हमरा देखल नहि तं फेर कोन शहरपर कवितावली तैयार कयल जाय! लऽ दऽ कऽ एकटा अपन दरभंगा शहरकें नीक जकाँ जनैत छी जकर मिचरा-मिचरा कऽ भूगोलक वर्णन करैत हम असंख्य कविता लिखि सकैत छलहुँ, मुदा ओकरा तँ पहिनहिसँ केओ दफानि लेने रहथि! आब जँ लिखले विषयपर पुनः लिखी तं चोरीक आरोप लागत! अनेरे हँसारति होयत । मुदा जखन सिरीजमे कविता लिखबाक जोआरि उठल छैक तं भला हम अपनापर कोना नियन्त्रण राखि सकैत छी! सिरीजमे कविता नहि लिखलहुं तं जीवन अकारथ चल जायत •••••••।
एहि चिन्तामे कय राति निन्न नहि भेल! कोन नगरपर धुरझार कविता लिखल जाय! एक मोन भेल जे हरद्वार की कोनो तेहन अस्पृश्य स्थानपर चल जाइ, ओतऽ एक-दू सप्ताह रही, ओहि ठामक नगर-बजार, टोल-मोहल्ला देखि कऽ ओमहरसँ एक मोटा कविता लिखनहि घुरी आ सभक मोंछ मरोड़ि लियैक! मुदा ई कोरोना काल! जाउ तं जाउ कोना! मुदा हमर अन्तरक महाकवि से वर्जना मानऽ लय तैयार नहि! की करी की नहि!
अचानक एकटा आइडिया! की कोनो आवश्यक छैक जे कोनो नगरेपर सिरीजमे कविता लिखल जाय! की कोनो अन्य विषयपर सिरीजमे कविता लिखि कऽ नव प्रयोग नहि कयल जा सकैत छैक! किएक ने कयल जा सकैत छैक! आखिर कहलो तं गेल छैक- लीक छाड़ि तीन चलय शायर सिंह सपूत । हम सिरीजदार कवितामे नव विषय आनि हम सबकें चौंका देबनि, सिहा देबनि! बस ओहि आधा रातिमे ओछाओन परसं उठि पुरना स्कूलवला काॅपी-किताब सभक जे बंडल छज्जीपर राखल छल तकरा उतारलहुं । गरदा झाड़ि कऽ ओकरा फोललहुं आ ताकऽ लगलहुं । भेटि गेल तिसरा-चौथाक ओ लेखवला काॅपी सब । उनटा कऽ पढ़लहुं तं अपने मुंहसँ आश्चर्यक सिसकी बहरा उठल । अरे महाकवि बनबाक बीज तं हमरामे ओहि तिसरे-चौथा क्लासमे पड़ि गेल छल । हमर ओ लेख सब विशुद्ध कविते तँ छल! अन्तर एतबे जे ओहि काॅपीमे हम सरदर लिखने रहियैक आ आब ओही वस्तुकें छोट पांती पैघ पांतीमे लिखि देबाक छल, कविता तं हमर सबटा तैयारे छल । बस ओहिमेसँ एकटा लेखकें निकालि हम तुरत आजुक कविताक रूपमे कोना सजा देलियैक से देखिये लेल जाय-
गाय, हमर गाय
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होइत अछि गाय एकटा पालतू जानवर
ओकरा होइत छैक चारिटा पैर
ओकरा माथपर होइत छैक दूटा सिंघ
गाइक पाछूमे होइत छैक एकटा नाङरि
गाइकें होइत छैक थुथुन
गाय हमरा लोकनिकेँ दैत अछि दूध
गाइक दूध होइत अछि पौष्टिक
गाइक दूधसं बनैत अछि
अनेक प्रकारक वस्तु
गाइक गोबर सेहो होइत अछि उपयोगी
गोबरक गोइठापर होइत अछि भानस
गोइठाक छाउर करैत अछि खादक काज
गाइक बाछा बनैत अछि बड़द
बड़दसं किसान जोतैत अछि खेत
गाइक एतेक उपयोगिताक कारणे
हमर लोकनि ओकरा कहैत छियैक माता!
एकटा अद्भुत कविता तैयार भऽ गेल । आब कहबाक प्रयोजन नहि जे हमर कविताक सिरीज कथीपर रहत! अरे पशु पर रहत, पशु पर! गाइ परक एहि कविताक बाद हम घोड़ा, हाथी, गदहा, बकरी सुग्गर, कुक्कुर, बिलाड़ि आदि आदि पर सिरीजमे कविता लिखि हम कविताक अमार लगा देब! आब कहू महाकवि के पूछय, विश्वकविक आसनपर बैसबासं हमरा केओ रोकि सकैत अछि! तखन के पुछैए एहि छोटका मोटका एहि पंचायत स्तरीय सम्मानकें! सरस्वती आ ज्ञानपीठ भेटनहि बुझू! ओहिनो ओहि पुरस्कारक संयोजक अपनहि लोक छथि ।
