
आँखि थाकल झमान ककर बाट तकैए,
आश घायल बेराम कोनो खाट तकैए ।
कोना बीतय ई काल से ककर साध छै,
नाओ बौखल नदीमे कोनो घाट तकैए ।
व्यूह तेहन रचल भेदि उबरब कठिन,
प्राण छटपट एहि दाओकेर काट तकैए।
कोनो भुतही अथाह मोनि डूबि रहल साँस,
घर मुनहर औनाइत मोन फाट तकैए ।
भेल प्योन चिरीचोत नियतिकेर खाय चोट,
जिवन गुदड़ी कोनहुं सतुआ साट तकैए ।
छल शेष किछु जे शाख भेल सगरो नीलाम,
चित्त बनिञा बहुधन्धी नव टाट तकैए ।
हमर अंतर रणभूमि घमासान द्वन्द्व युद्ध,
हारि अपनहिंसँ फेर राज-पाट तकैए ।
(श्रीशंकरदेव झा जी कें फेसबुक वाॅल सं)