हथटुट्टा कुरसी’क ओ ‘नेनमणि’

कखनो काल कोनो साधारण बात,कोनो लघु घटना अहाँक जीवन केँ एहि रूपें प्रभावित कय महत्वपूर्ण बना देत जकर अहाँ कल्पना नहि कयने रहब परिणामस्वरूप अहाँक लेल ओ अविस्मरणीय भ’जायत । एहन बात रंगमंचक दुनिया मे सेहो होइत छैक।कतेको रंगकर्मी संगे एहन परिस्थिति अबैत छैक। से मोन पड़ैत अछि भंगिमा द्वारा मंचित एकांकी ‘हथटुट्टा कुरसी’ जकर प्रदर्शन 4 नवंबर 2007 केँ शेखर जयंतीक अवसर पर विद्यापति भवन मे भेल छलैक।
विद्वान लोकनिक मतानुसार नाटकक तीन महत्वपूर्ण स्तम्भ नाटककार,कलाकार आ प्रेक्षक एक संग भए जाय तँ नाटक केँ मजगूती प्रदान करैछ। युग-जीवनक अनुरूप नाट्य साहित्यक सृजन करब नाटककारक प्रथम दायित्व होइत छैक। एहिमे स्वनामधन्य नाटककार पंडित सुधांशु ‘शेखर’ चौधरीक नाम अग्रगण्य अछि। हुनक कम सँ कम शब्द मे जीवन-दर्शन केँ छोट-छोट नाटकीय दृश्यक माध्यमे प्रस्तुत करबाक सामर्थ्य अनुकरणीय अछि। ‘हथटुट्टा कुरसी’ सन छोट मैथिली एकांकी अपन कथ्य,शिल्प आ मंचीय तकनीकी क कारणें बेस लोकप्रिय अछि।ई जतबे पठनीय अछि ओतबे मंचीय सेहो अछि,तकर अनुभव हमरा स्वयं भेल अछि।
अभिनेता रंगमंचक प्रमुख सर्जक कलाकार होइछ,जे
नाटककार सँ ‘शब्द’ आ निर्देशक सँ ‘गति’ ग्रहण करैछ,जकरा दर्शकक संग सम्बन्ध स्थापित करब रहैत छैक,एकाग्रताक भाव प्रदर्शित करबाक प्रयोजन रहैत छैक।
नाटकक विषय-वस्तुक साधारणीकरण दर्शकक भाव सँ होइत छैक।दर्शक केँ सेहो सहृदय हैब अनिवार्य किएक तँ नाटकक सफलता/असफलताक निर्णायक दर्शके होइत अछि। से जखन रंगमंच पर समसामयिक जीवन सँ ओतप्रोत विषय-वस्तु केँ व्यवस्थित रूपें प्रस्तुत कएल जाइछ तखन दर्शक रंगमंच सँ संलग्न होइत अछि।
से एहि तीनू तत्वक समन्वय भेलैक ओहि प्रदर्शन तिथि केँ।
मोन पड़ैत अछि ,आदरणीय शरदिन्दु कुमार चौधरीक प्रस्ताव जे स्व.सुधांशु ‘शेखर’चौधरीक जयन्तीक अवसर पर भंगिमा एकटा हुनक नाट्यकृतिक प्रदर्शन करय । समय मात्र एक सप्ताहक छलैक । एतेक कम समय मे की भ’सकैए ! तखन किशोर जी कहब छलनि जे ‘हथटुट्टा कुर्सी’क मंचन सम्भव भ’सकैए। अवसर नीक छलैक तेँ भंगिमा केँ एहिमे अपन प्रस्तुति अवश्य करक चाही। उचित आर्थिक सहयोग सेहो भेटबाक बात भेल छलैक।अध्यक्ष उमाकान्त जी आ सचिव आशुतोष जीक सेहो सहमति ।
किशोर जी निर्देशनक दायित्व लेलनि । समय कम तेँ विशेष मेहनतिक आवश्यकता छलैक । हमरा कहल गेल ‘नेनमणि’बाबू जे एकांकीक मुख्य पात्र छलैक,तकर भूमिका करैक लेल। ओकर बेटा कंटीरक भूमिका मे डॉ अभय कुमार यादव आ डाकपिनक भूमिका ब्रह्मानंद झा । पहिल दिनुक पाठ भेल । हम ओहि समय इएह सोचल जे एहि कम समय मे संवाद पूरा याद भ’जाय तखन जे हेतैक से देखल जेतैक। मुदा घर पर अयलाक बाद राति मे गंभीरता सँ पढ़ल। एहि एकांकी केँ हाईस्कूल मे जखन पढ़ने रही तखन सेहो नीक लागल रहय। मुदा एकर कथ्य एतेक गंभीर छै आ एहि नेनमणि पात्रक अभिनय एतेक चैलेंजिंग छै कोनो अभिनेताक लेल,से आब बुझलिएक । कोना एहि पात्रक निर्वहन कयल जाय, ताहि हेतु मंथन मे लागि गेलहुँ । किशोर जी रिहर्सल मे हमर मुख मुद्रा हेतु सेहो टिप्स देलनि। एम्हर हम क्रमशः एहि चरित्र केँ गंभीरता सँ लेबय लगलहुँ । गामक पृष्ठभूमि रहलाक कारणें एहिपर विचार करय लगलहुँ । गाम मे देखने छी, पढुआ कमौआ पूत कोना पाहुन बनल अबैए गाम ,कोना घरक लोक ओकर सत्कार मे बेहाल रहैया । हाकिम बनि गेल बेटाक बड़ाई करैत गामक बूढ़ बाप केँ सुनने छी, हुनक अंतर्व्यथाक अवलोकन सेहो हुनक भाव भंगिमा सँ कयने छी। बस एहि पर काज करबाक अछि। एहि 20-25 मिनटक एकांकीक तैयारी लेल अपना केँ तैयार करय मे लागि गेलहुँ अपन क्षमता भरि। संवाद सम्प्रेषण,मुद्रा,ओहि चरित्र मे छिपल अंतर्निहित भाव केँ प्रकट करबाक हेतु पूर्वाभ्यास बहुत आवश्यक। से, ऑफिस सँ एलाक बाद तीन चारि बेर रिहर्सल प्रतिदिन होमय लगलैक। निर्देशक किशोरजी एकबेर करा देथि,अपन सुझाव देथि आ प्रेस चलि जाइथ । मुदा अभयजी,ब्रह्मानंद भाइ टिकल रहथि। पूर्वाभ्यास मे आशुतोष जी आ उमा भाइ सेहो आयल करथि । संगीत आशुतोष जीक छल ।
4 नवंबर 2007 केँ संध्या मे विद्यापति भवन मे आयोजित शेखर जयंतीक अंतिम कार्यक्रम एहि एकांकीक प्रस्तुति रहैक। पूरा प्रेक्षागृह प्रबुद्ध प्रेक्षक लोकनि सँ भरल। नाट्य प्रस्तुतिक दरम्यान एकदम पिन ड्रॉप साइलेन्स । से पहिल बेर एहन तरहक वातावरण मे एहि तरहक लघु नाट्य प्रस्तुति करबाक अवसर छल। प्रस्तुति करैत ओहि समय की लागि रहल छल से नहि कहल जा सकैत अछि । सह-अभिनेताक संग, संगीतक बहुत सहयोग रहल। नाटक समाप्त भेलाक बाद प्रबुद्ध दर्शक लोकनिक एहन तरहक प्रत्यक्ष प्रशंसा पहिल बेर सुनबाक अवसर भेट रहल छल। से नाटक आ अभिनय दुनूक। डॉ जगन्नाथ मिश्र जे उदघाटनकर्ता छलाह,कहलनि–हमरा जरूरी काज सँ चलि जेबाक छल मुदा नाटक शुरू भेलै आ नाटक एतेक नीक लागय लागल जे कहलहुँ समाप्त भेलाक बादे जायब। न्यायमूर्ति मृदुला मिश्र कहलनि बहुत सुंदर नाटक आ अभिनय । एहने तरहक विभिन्न साहित्यकार आ रंगकर्मी अग्रज आ अनुज सभहक उद्गार जकर अपेक्षा नहि छल जे एतेक छोट भूमिका लोक केँ एना नीक लगतैक !
साहित्यकार मधुकांत झाजीक ओ उद्गार एखनो मोन पड़ि जाइछ ,भवनक बाहर ठाढ़ रहथि,हाथ पकड़ि कहलनि , हे अहाँ ई लिखब-तिखब छोड़ू आ खाली अभिनय करू। हम बस मुस्काइत मधुकान्त सर केँ ओहि समय किछु नहि कहि सकलिएनि। डॉ कमल मोहन चुन्नू जी अपन लेख मे हमर एहि पात्रक अभिनय केँ जखन विशेष रूप सँ उल्लेख कयलनि तँ पढलाक बाद कने कालक लेल भावुक भ’गेल रही। अभिनेताक लेल इएह तँ पुरस्कार छै। ओना एक संयोग बनि गेलैक ओहि संध्या, हम सैह बूझि रहल छी। एखनो एहि प्रस्तुति मे बहुत किछु कएल जा सकै छै,आरो बहुत संभावना छैक। भंगिमा द्वारा एहि एकांकीक प्रस्तुति बहुत पहिने 1990 मे भवनाथ झाक निर्देशन मे भेल छलैक। हम ओहि प्रस्तुति मे नहि रही। जे-से–।
दुर्भाग्य सँ एहि नाट्य प्रस्तुतिक कोनो फ़ोटो हमरा लग नहि अछि। कतेक बेर सोचल जे आदरणीय शरदू जी केँ कहबनि जँ एकोटा फोटो जँ होइ तँ देबैक लेल,से कहब बिसरि जाइ छी ।
एहि एकांकी एक बेर पुनः प्रदर्शन चेतना समिति द्वारा आयोजित ललित जयन्तीक अवसर पर 2 फरवरी 2017 केँ भेलैक। 10 बर्षक बाद भेल एहि प्रस्तुति मे ‘कंटीर’ केर भूमिका मे निखिल रंजन छलाह। इहो बहुत नीक अभिनय कयने छलाह। डाकपिन बनल छलाह संजीव झा। छोट भूमिका मे प्रभावी अभिनय । एहू बेरक प्रस्तुतिक कैमरा बला फोटो नहि उपलब्ध अछि।हं मोबाइल सँ लेल गेल किछु फोटो अछि सैह–।

(कुमार गगन जी कें फेसबुक वाॅल सं साभार)

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