आदर्श विवाह

’मुदा ई कि भेल ? सुनैत रही जे अहाँक सभ बात पक्का भ गेल अछि। तखन एना किएक ? ’

’हँ, बात त पक्के छल। मुदा दोख हमरे जे एते पैघ आदमीक बहुत छोट बात नहि बुझि सकलौंह ?’ हारल स्वर मे सरयू बाबू बजलाह।

’से की? अहाँक कथा त आदर्शे ठीक भेल छल की ने ? फेर कोन व्यवधान भ गेल? बरागत अपना बात सँ फिरी गेलाह की?’

नहि ओ सभ तक अपना बात सँ नहि मुकरलाह, हमही एतेक पैघ भार उठाबै मे असमर्थ रही।

आदर्श आ भार ? हम किछु बुझि नहि सकलौंह, कने फरिच्छा के कहूने?

आ की कहू? ओ लोकनि त देवता छथि । जतैक पैघ ओतबा उदार आ विनम्र। पुरान धनाढय। कोनो वस्तुक कमी छैन्ह, जे माँग लेताह ? तखन हमरे करम फूटल छल जे भगवान ओतेक सामर्थ नहि देलन्हि जे हुनकर देल सूचीक सभ सामान….. ।

एहि सं आगू नहि बाजि सकलाह सरयू बाबू। मुड़ी गोतने आगू बढि गेलाह, ’ शायद आदर्श ’शब्दक सही अर्थ ताकय।

विपिन बादल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *