कुमारी मीनू
बिहार में चुनावक शंखनाद भऽ गेल अछि। ऐकर संगे नेताक मन में उथल-पुथल मची गेल अछि। नेता कि आम जनता सब सेहो उधेरबुन में फंसल छथि। ऐही बेर केकर नाव के पारि लगाबि। जनता लोकनिक के किछु बुझबा में नहिं आब रहल अछि। एगो तो ‘कोरोना’ के ऐहन प्रकोप और दूसर एहि समय में ‘विधानसभाक चुनाव’।
एहि बरखक आगमन मानू ‘कोरोना’ से भेल। शुरूआतक एकाध मास तऽ ठीक रहल, ओकर बादक तऽ ‘कोरोना’ के ऐहन प्रकोप भेल जे लोग सब के किछु बुझबा में नहिं आएल कि भऽ कि रहल अछि। दिल आ दिमाग सब सून भऽ गेल। मार्च मास में ‘लाॅकडाउन’ लगबाक बाद तऽ किछु दिन निक लागल, किएक कि आराम सऽ घर पर रहबाक अवसर जे भेटल। मुदा किछ दिनक बाद तऽ लोकनिक सब बैचेन भऽ गेला। नहिं बाहर जा सकैत छलैथ आर नहिं केकरो से भेट घांट भ सकैत छल। मनोरंजनक एक साधन टीवी छल ओहियो में एकमात्र ‘कोरोना’ आर ‘चीनक’ चर्चा। नहिं राजनीतिक दल आर नहिं आम जनता के कोनो संपर्क होएत छल। एहि कारण सऽ नेता आर जनता में कोनों तरहक संबंध नहिं बनि सकल। एकर कारण भेल जे नेता आर जनता दूनू के किछु अधूरा-अधूरा लागैत अछि। ‘लाॅकडाउन’ खुलबाक और ‘चुनाव’ अएलाक बावजूद दूनू में कोनो तरहक विचारक आदान प्रदान नहिं भ पाबि रहल अछि।
विचारक आदान प्रदान नहिं होएबाक कारण नेता और जनता दूनू उधेरबून में फंसल छथि। एक त कोरोना में लाॅकडाउन में घर में बंद और एकर तुरंत बाद बिहार में विधानसभा के चुनाव। लागैत अछि जेना जनता और नेता दूनू के दिमाग और मन के हौल क देने अछि। केकेरा बुझबा में नहिं आबि रहल अछि कि कथि कएल जाए और कथि नहिं। नेता सबहक मन में अछि कि एहि बेर जनताक मन किम्हर जाएैत। जनताक नब्ज़ (नाड़ि) बुझबाक हुनका कोनो मौका नहिं भेटल अछि। जनता के मन में अपन प्रभाव डालबाक सेहो कोनो अवसर नहिं भेटल। कोरोना के कारण ‘लाॅकडाउन’ लागल आर एकर बाद डर के कारण जनता से संपर्क में सेहो कमी आबि गेल। रहल सहल कसर चुनाव के लेल चुनाव आयोग के ओरि से जारि निर्देश पूरा क देलक। बहुत लोक के एक साथ जमा नहिं कएल जा सकैत अछि। ओहि ठाम सत्ता पक्ष ई सोेचैथ अछि जे फेर सऽ ‘मलाई’ खेबाक लेल भेटल कि नहिं तऽ दूसर दिस विपक्षी सोचैथ छथि जे बहुत दिन भऽ गेल सत्ताक आनंद प्राप्त भेल। इ सुख कहिया भेटत।
ओहि ठाम जनता के मन में सेहो उथल-पुथल अछि। जेना-जेना दिन नजदीक आबि रहल अछि अकुलाहट बढ़ैत जा रहल अछि। जनता सोचि रहल अछि जे अखन धरि जे सरकार के चुनल ओ काम केलक कि नहिं। अगर केलक त ओकरा औरि अवसर देनाए उचित रहत कि नहिं। दूसर दिस ईहो सोचैत छैथि जे अगर इ सरकार काम नहिं केलक तऽ दोसर केकरा चुनल जाऽ सकैत अछि। अगर दोसर के अवसर देब तऽ ओ काम करत कि सिर्फ घोटाला करत। कहिं फेर सऽ तऽ परेशानी नहिं भऽ जाएैत। कहिं ऐहन तऽ नहिं होएत जे कोनो दल के पूर्ण बहुमत नहिं भेटय आऽ मिलल-जुलल सरकार बनि जाएैत आऽ सरकार अपना के स्थिर रखबाक लेल खालि काम करैय बाकि जनता के दुखक कोनो टोह नहिं लेल।
एतबै धरि नहिं अछि। सबहक मन में एक औरों चिंता अछि जे ‘कोरोना’ के आंकड़ा कतऽ जाएैत। चुनावक बाद बिहार में कोरोना मरीजक संख्या बेतहासा नहिं बढ़ि जाएैत। सुनवा में तऽ ईहो आबि रहल अछि जे चुनावक बाद कहि बिहार में फेरो ‘लाॅकडाउन’ नहिं लागि जाए। बिहार में चुनावक समय त्योहारक बीच राखल गेल अछि। बिहार से बाहर रहय बला सब सोचथि जे ऐहि बेर बिहार जाउ कि नहीं। अगर चुनावक बाद ‘लाॅकडाउन’ लागि गेल तऽ फंसि जाएब।
कहबाक तात्पर्य अछि जे बिहारक नेता, जनता और प्रवासी बिहारी सब लोकनि उधेरबुन में जी रहल छथि। केकरो मन शांत नहिं अछि। सब चिंता सऽ घटैत जा रहल छैथि। जनता के इ उधेरबुन तऽ किछु समय बाद समाप्त भऽ जाएैत, मुदा नेता सब एहि सऽ कहियो नहिं उबरि सकता।

(लेखिका पत्रिकार छथि)
