हिंदू कऽ पैसा हिंदू पर खर्च हुअय

रीना एन सिंह

“हिंदू कऽ पैसा हिंदू पर खर्च हुअय” ई सामाजिक सशक्तिकरण आ सांस्कृतिक संरक्षण कऽ मूल सिद्धांत अछि। जखन समाज कऽ धन अपनहि धर्म, शिक्षा, मंदिर, गौशाला, वेदशाला आ जरूरतमंद वर्गक उत्थान मे लगायल जाएत अछि, तखने एकटा सशक्त, आत्मनिर्भर आ संगठित समाजक निर्माण होइत अछि। जँ हिंदू समाज अपन संसाधनक उपयोग अपनहि धार्मिक, शैक्षिक आ सांस्कृतिक संस्थानक संरक्षण आ विकास मे करए, तँ न केवल अपन परंपरा सुरक्षित रहत, बल्कि आबए वला पीढ़ी सेहो अपन जड़ सँ जुड़ल रहबाक प्रेरणा पायत।

मंदिर आ तीर्थाटन (प्रबंधन, स्वायत्तता, संरक्षण आ लोककल्याण) लेल केंद्र या राज्य सरकार द्वारा एकटा विधेयक आनल जाए, जाहिक उद्देश्य भारतक संविधानक अनुच्छेद 25 आ 26 द्वारा देल गेल धार्मिक स्वतंत्रता कऽ अधिकारक रक्षा करनाइ, मंदिरक पारंपरिक स्वायत्तता कें फेर सँ स्थापित करनाइ, मंदिर सभ कें सामाजिक, आर्थिक आ सांस्कृतिक विकासक केंद्र बनौनाइ आ मंदिर निधिक माध्यम सँ निर्धन सभक उत्थान आ लोककल्याण सुनिश्चित करनाइ हो। ई अधिनियमक उद्देश्य ककरो मंदिर, तीर्थस्थल आ कोनो हिंदू धार्मिक संस्था, विधिक व्यक्ति “ट्रस्ट” द्वारा मंदिर प्रबंधन लेल स्वायत्त निकाय, “तीर्थ” धार्मिक आ सांस्कृतिक स्थल, “पंचशाला” (वेदशाला, आरोग्यशाला, गौशाला, संगीतशाला, मल्लशाला) आ समाज कल्याण कार्य मे उपयोग होइत स्थान सभ कें समाहित करनाइ हो।

भारतीय सभ्यताक शासन तंत्रक आधार मंदिर रहल अछि, जतय मंदिरक आय आ देवता के अर्पित दान सँ समाजक समस्त व्यवस्था चलैत छल आ एहि संसाधन सँ निर्धनक उत्थान आ जनकल्याणक कार्य होइत छल। प्राचीन भारत मे मंदिर केवल आस्था कऽ केंद्र नहि छल, बल्कि एकटा व्यवस्थित “सामाजिक शासन तंत्र” छल, जतय गुरुकुल आ वेदशाला चलैत छल, जतय ऋग्वेद मे वर्णित “सभा” आ “समिति” कऽ परंपरा अनुसार ज्ञान-विमर्श आ निर्णय होइत छल आ छात्र वेद, शास्त्र, खगोल, आयुर्वेद आदि पढ़ैत छल।

एहि प्रकार आरोग्यशाला द्वारा समाज कें नि:शुल्क या कम लागत पर चिकित्सा देल जाएत छल, जाहिक आधार चरक संहिता आ सुश्रुत संहिता रहल। न्याय व्यवस्था मे मंदिरक आचार्य धर्मशास्त्र अनुसार विवाद सुलझाबैत छल, जतय न्याय तेज, निष्पक्ष आ लोकहितकारी होइत छल। आर्थिक व्यवस्था मे मंदिर गौशाला, अन्नक्षेत्र, कृषि आ दानक केंद्र छल, जाहि सँ स्थानीय अर्थव्यवस्था कें बल भेटैत छल आ रोजगार उत्पन्न होइत छल।

कला, संस्कृति आ शारीरिक प्रशिक्षण लेल संगीतशाला आ मल्लशाला सेहो चलैत छल, जतय कला कें धर्म आ लोकशिक्षा कऽ माध्यम मानल जाएत छल। तीर्थ व्यवस्था सेहो राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समन्वय आ आर्थिक प्रवाहक मजबूत माध्यम रहल अछि।

एहन स्थिति मे आज मंदिरक रक्षा आ पुनर्स्थापना लेल आवश्यक अछि जे ओ सभ कें सरकारी नियंत्रण सँ मुक्त कए स्वायत्त ट्रस्टक अधीन आनल जाए, संविधानिक अधिकार (अनुच्छेद 25-26) कऽ रक्षा लेल न्यायालय मे प्रभावी पैरवी हो, प्रशासन मे संत, विद्वान आ समाजक भागीदारी सुनिश्चित हो, पारदर्शी लेखा-जोखा, डिजिटल ऑडिट आ सार्वजनिक रिपोर्टिंग लागू हो।

पंचशाला मॉडल (वेदशाला, आरोग्यशाला, गौशाला, संगीतशाला, मल्लशाला) कें आधुनिक रूप मे फेर सँ विकसित कएल जाए, जकर रूप स्कूल, आयुर्वेद केंद्र, सांस्कृतिक अकादमी आ फिटनेस केंद्र जेकाँ हो। तीर्थ मार्गक पुनर्विकास कए यात्रियन लेल सुरक्षित, स्वच्छ आ व्यवस्थित व्यवस्था बनाओल जाए आ स्थानीय अर्थव्यवस्था सँ जोड़ल जाए।

सांस्कृतिक जागरूकता द्वारा इतिहास आ शास्त्रक प्रचार-प्रसार कए युवा पीढ़ी कें मंदिर सँ जोड़ल जाए आ डिजिटल माध्यम सँ सही जानकारी देल जाए। प्राचीन मंदिरक वैज्ञानिक संरक्षण, अतिक्रमण हटौनाइ आ धरोहरक पुनरुद्धार सुनिश्चित हो।

एहि प्रकार मंदिर व्यवस्था केवल धार्मिक नहि बल्कि एकटा पूर्ण “सभ्यतागत शासन मॉडल” छल। जँ एकरा आधुनिक समय मे फेर सँ जीवित कएल जाए, तँ ई भारत कें सामाजिक, आर्थिक आ सांस्कृतिक रूप सँ सशक्त बना सकैत अछि। एहि उद्देश्य लेल ‘मंदिर आ तीर्थाटन विभाग’ क गठन जरूरी अछि, जे देखरेख आ संचालन सुनिश्चित करत।

मंदिर निधिक उपयोग अनिवार्य रूप सँ लोककल्याण लेल कएल जाए। एकर उपयोग निर्धन सहायता, गरीब कन्याके विवाह, विधवा, वृद्ध आ असहाय सहयोग, अनाथ बच्चा पालन-पोषण, निःशुल्क भोजन, शिक्षा, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सेवा, आयुर्वेद केंद्र, गौसंवर्धन, कौशल विकास, रोजगार आ महिला सशक्तिकरण मे प्राथमिकता सँ हो।

अधिनियम लागू भेला पर मंदिर सभ सँ सरकारी नियंत्रण समाप्त कएल जाए आ मंदिर निधिक उपयोग कोनो गैर-हिंदू उद्देश्य लेल प्रतिबंधित हो।

 

(लेखिका सुप्रीम कोर्ट मे अधिवक्ता छथि।)

ई लेखकक निजी विचार अछि।

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