भुखला गुआर आ साबेघास – मैथिलीक लोक रामकथामे

रामानंद झा रमण

मैथिलीमे अनेक लोक महागाथा अछि। ओहिमे ‘राजा सलहेस’, ‘लोरिक-मनिआर’, ‘दुलरा-दयाल’, ‘नइका-बनिजारा’, ‘गांगो-गोढ़िन’, ‘वंशीधर-बाभन’, ‘कारिख-पजियार’, ‘लवहरि-कुशहरि’ आदि प्रमुख अछि। ई कहिआसँ लोककंठमे अछि, कहब सम्भव नहि। एहिमे किछु जातीय देवताक रूपमे पूज्य भए गेल छथि। किछु लोकगाथा नायकक उपयोग जाति विशेषक लोक अपन ‘पोलिटिकल स्पेस’क लेल करए लगलाह अछि। एहि लोक महागाथामे ‘लबहरि- कुशहरि’ रामकथापर आधारित अछि। ई लोकगाथा जाति विशेषसँ सम्बन्धित नहि अछि किन्तु मल्लाह जातिक लोकक कंठमे ई सुरक्षित छल। एहि लोक महागाथाक आधारपर डा. ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ लिखित मैथिलीमे एक उपन्यास सेहो अछि।
लोककंठमे जीवित ‘लबहरि-कुशहरि’क विषय-वस्तु लंका-विजयक उपरान्त राजाक रूपमे रामक राज्याभिषेकसँ सीताक पृथ्वी-प्रवेश धरिक घटना वर्णित अछि। लोक महागाथा अनाम होइत अछि तथा रचनाकाल सेहो अज्ञात रहैत छैक। मुदा लोचकताक कारणें ओहिमे घटना सभ जोड़ाइत जाइत छैक। लोकगाथा गायकक सर्जनात्मक प्रतिभासँ एहन-एहन वर्णन आबि जाइत छैक जाहिसँ ओकर मूलपाठसँ समयक किछु अनुमान कएल जा सकैछ। मैथिली लोकगीत आ व्यावहारिक गीतमे सीता जगज्जननी नहि छथि, राम सेहो अवतारी पुरुष नहि छथि, मुदा ‘लबहरि-कुशहरि’क आरम्भ माँ जानकी आ भगवान रामचन्द्रक वन्दनासँ होइत अछि। एहिसँ अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ‘लबहरि-कुसहरि’क उपलब्ध पाठ(मैथिली लोकगाथा, संकलन-सम्पादक-प्रो.विश्वेश्वर मिश्र) मिथिलामे राम सम्प्रदायक प्रभाव-विस्तारक अभ्यन्तरक थिक। –
‘कलजोरि परिनाम करै छी मइआ जानकी आब यौ
बैठ छला जे दादा रामचन्द्र भगवान यौ।’
‘लबहरि- कुशहरि’ लोक महागाथाक अनुसार रामचन्द्रक एकटा बहिनि छलथिन राधिका। सीता आ राधिकामे हास-परिहास होइत अछि। राधिका अपन भौजी सीतासँ कहैत छथि जे ओ दुष्ट रावणकेँ दण्डित करए चाहैत छथि। से ओकर ‘सिरखार’ बना केँ देखाए दिअ जे रावण केहन छल। सीताक कहब छनि जे ओ रावणकेँ कहिओ देखने नहि छथि, कोना ओकर सिरखार बनौतीह। राधिका कहैत छथिन जे अहाँ जगज्जननी भगवती छी, जगदम्बा छी, सब किछु जनैत छी। ननदिक हठक समक्ष निश्छल हृदया जगदम्बा स्वरूपा सीता ध्यानस्थ भए रावणक आकृति बना दैत छथिन। सीताक आंगुरमे संचित अमृतक स्पर्शसँ ओ सिरखार सजीव भए गेल। विशालकाय रावणकेँ साक्षात देखि सभ केओ डरें भागि गेलीह । केवल रहि जाइत छथि सीता। सीताक ननदि राधिका अपन भाए राजा रामचन्द्रक ओतए जाए सीता द्वारा परपुरुषक संग सम्भाषणक लुत्ती लगबैत अछि। रामचन्द्र हनुमानकेँ जाँचक भार देलनि। स्थिति देखि हनुमान द्विविधामे पड़ि गेलाह। ओ गोल-मटोल उत्तर देलथिन।
‘बड़ा जुलूम तों केलह माता कलंक अजोधा आब यौ
भगवान के आब बाटो नै चल देतनि लोक आब यौ
कोना के चुगली तोहर करबह नूनो खेलिअ आब यौ
राम के लग हनुमान जब पहुँचल लए क अपन बात आब यौ
राम से दागा देलकनि हनुमान जी आब यौ’।
हनुमानक सफाइ काज नहि आएल। परपुरुषक संग सम्भाषणक लेल सीताकेँ दोषी मानल गेल। लोकापवादकेँ देखैत सीताकेँ देश-निर्वासनक दण्ड भेटल। सीता राजसभामे उपस्थित भए सभासदकेँ कहैत छथिन –
‘रामचन्द्र के सबहा लागल बरम्हा लोक के आब यौ
छप्पन कोटि देब बैठल रहथि रामक गादी लग आब यौ
अइ ठाम मइआ जबाब करै छथि आब यौ
सुनि लिऔ देव-मुनि सब हमर जबाब आब यौ
बड़ रे विपत्ति देलनि हमरा खामिन जखन आब यौ
हम जाइ छी जंगल मुनि सब देवलोक सब आब यौ
छओ महिना के गरभ हमरा संग जाइए आब यौ
केओ कलंक नै हमरा दिह अजोधा जी मे आब यौ।
सीख दिऔ आब देवन सब जाइछी बनबास आब यौ।’
सीताक पक्ष लेबाक हेतु हनुमानकेँ फलहीन जंगलमे निर्वासनक दण्ड देल गेलनि। सीता दुखी मनसँ वन प्रस्थान कएल। जंगलहिमे ओ पुत्रवती होइत छथि। लव-कुश ऋषि आश्रममे पैघ होइत छथि। अयोध्याक सेनाक संग युद्धक समय सीता अपन पुत्रकेँ कहैत छथिन जे रामचन्द्र, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान आ भुखला गोआरपर प्रहार नहि करब।
‘छओ गोट मूर बकसिहें दिहें अजोधाजीमे आब यौ
पहिले मूर बकसिहें बौआ प्रभुजी के आब यौ
दोसर मूर बकसिहें बौआ लछुमन के जे आब यौ
तेसर मूर बकसिहें रे बौआ भरत लाल के आब यौ
चारिम मूर बकसिहें रे बौआ सतरूहन के जे आब यौ
पांचम मूर बकसिहें रे बौआ हनुमान के आब यौ
छठम मूर बकसिहें रे बौआ भुखला गोआर के जे आब यौ
अजोधा के जंगलमे छैक भुखला जे गोआर यौ
राज जनकपुरक ओ छिअइ चरबहबा छिअइ आब यौ
तीन लाख गइआ हमरा दहेजमे देलखिन आब यौ।
तही गइआ के चरबाहा छिअइ भूखला जे आब यौ।
भुखला गोआर सीताक नैहरक थिकनि। विवाहमे रामचन्द्रकेँ दहेजमे तीन लाख गाय चरबाहक संग राजा जनक देने छलथिन। भुखला गोआर ओही गायक चरवाह थिक। भुखला गोआरकेँ एक लाठी देने छथिन जाहिसँ ओ ककर मूरी छैक से लव-कुशकेँ चिन्हा सकैत छनि। एकर अतिरिक्त ओ आनो प्रकारक काज कए सकैत अछि।
युद्धक पश्चात भेल परिचय-पातक उपरान्त लक्ष्मण रथक संग जानकीक समक्ष उपस्थित होइत छथि। जानकी प्रभुजीकेँ देखि अपन नयन तृप्त कए लैत छथि। मोने मोन प्रणाम करैत छथिन। फेर धरती मातासँ फटबाक अनुरोध करैत छथि। धरतीमे समाइत जानकीकेँ पकड़बाक हेतु रामचन्द्र दौगैत छथि। मुदा हाथमे केवल सीताक केश अबैत छनि। जानकी पृथ्वीमे समा जाइत छथि। रामचन्द्रक हाथमे आएल सीताक केशकेँ रामचन्द्र धरती पर फेकि दैत छथि। सीताक ओ केश साबे घासक रूपमे सम्पूर्ण संसारमे पसरि जाइत अछि। रामचन्द्र सरयूमे शालिग्राम भए जाइत छथि।-
‘जानकी मइआ प्रभुजी के नजरि से देखल आब यौ
सत सुमरि लेब धरती के श्री जानकी मइआ आब यौ
फाटू फाटू धरती माता पाताल जेबै आब यौ
रामचन्द्र जी झट द’ माताक झोंटा धरइए आब यौ
हाथ मे झोंटा रामचन्द्र के रहि गेल माता गेली पाताल यौ
झोंटा फेकि देल रामचन्द्र जी जंगलमे आब यौ
जानकीक झोंटा साबे उपजि गेल दुनिया संसारमे आब यौ
ओही ठाम जे राम के बिरोग जे बहुत भ’ गेलैन आब यौ
अजोधा के धारमे रामजी शालिग्राम भ’ गेला आब यौ
सब देवता सब मिलि के ओइ जंग शालिग्राम उठबइए आब यौ
ओहिठाम सतयुग जे चल गेल कलियुग आबि गेल आब यौ
चोला छोड़ि देल रामचन्द्र जी सरजू तटपर आब यौ
जय जय बोली सीताराम भगवान नारायण आब यौ।’
‘लबहरि-कुशाहरि’क आरम्भ आ अन्त – भगवान आ भगवतीक रूपमे सीता एवं रामक वन्दनासँ होइत अछि। स्पष्ट अछि मैथिलीक मांगलिक गीत जकाँ ‘लबहरि-कुशहरि’मे सीता मिथिलाक बेटी एवं राम अयोध्याक राजा नहि छथि, अपितु सीता जानकी मइया, जगदम्बा आ रामचन्द्र नारायणक अवतार छथि।
सीताक केशक साबे घास भए संसारमे पसरि जाएब ध्यान देबा योग्य अछि। प्लास्टिकक रस्सीक निर्माणक पूर्व मिथिलामे एही साबेक जौड़ बंटाइत छल। कोरो-बातीमे बन्हन पड़ैत छलैक आ बन्हबाक आनो काज एही जौड़सँ होइत छल। जे धरतीमे समाइत रामचन्द्रक हाथमे आएल सीताक केशक रूपमे पसरल अछि।

पेंटिंग: Bandna Singh (सम्पूर्ण रामायण)

साभार: मैथिली मचान

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