नहुएँ-नहुएँ लाल भए रहल अछि रङ्ग

यात्रीजीक एकटा कविता छनि : जोड़ा मंदिर । पत्रहीन नग्न गाछक ‘जोड़ा मंदिर’ । तरौनी गामक सरजुग राउतक बनाओल जोड़ा मंदिर । गामक बाध मे बनल ई जोड़ा मंदिर घसबाहिनि सँ लए कए बटोही पर्यन्त लेल कौतुहलक विषय रहल अछि अदौ सँ । साहित्यकार सभक लेल तँ सहजहि।

समय बदलल । परिवेश बदलल । कच्ची सड़क आब पक्की बनि गेल। एहि सङ्ग बदलि गेल अछि ‘जोड़ा मंदिर’क स्वरूप । भखरैत प्लास्टरक सङ्ग मद्धिम होइत रहल अछि चुनक रङ्ग। आब मंदिरक रङ्ग भेल अछि लाल । यात्रीजीक देखल स्वरुप सँ भिन्न अछि एखुनका मंदिरक रङ्ग-टीप । ई जोड़ा मंदिर आइयो ओहिना अछि कौतुहलक विषय । साहित्यिकि तीर्थ जकाँ भए रहल अछि उजागर।

तरौनीए नहि, मिथिलाक कतेको गाम मे एखनहुँ भेट जाएत सरजुग राउत । जे नहि भेटैत अछि से छथि ‘यात्री’ । जोड़ा मंदिरक स्थूल परिकल्पना मे एकटा जीवंत सामाजिक सत्ता केँ बखलोइया छोड़ाबयबला यात्री । एहि प्रांतर मे ठाढ़ एहि मंदिरक रङ्ग जँ लाल देखने रहितथि यात्री तँ की कविताक मिजाज किछु बदलल रहैत ? सोचैत छलहुँ किछु …

 

साभार:  विकास वत्सनाभ 

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