
कुमकुम झा
नई दिल्ली। जखन कोनो व्यक्ति सूर्यक विषय मे सोचैत अछि, त ओहिमे ओकर तेज, ओकर प्रकाश आ चमक मन मे आबि जाइत अछि। जेना सूर्य आ ओकर चमक के कखनो अलग नहि कएल जा सकैत अछि, तहिना माता सीता आ भगवान श्रीराम के सेहो कखनो अलग-अलग नहि देखल जा सकैत अछि, आ ने देखल जाए के चाही।
संपूर्ण विश्व मे माता सीता “जगत जननी” के रूप मे प्रसिद्ध छथि, मुदा मिथिला मे हुनका “जानकी” नाम सँ अधिक स्नेहपूर्वक पुकारल जाइत अछि। जनकक पुत्री होबाक कारणे हुनकर ई नाम पड़ल। जानकी नवमी के दिन राम नवमी जेकाँ अत्यंत शुभ मानल जाइत अछि। धार्मिक मान्यता अनुसार एहि दिन जे श्रद्धालु विधि-विधान सँ राम-सीता के पूजन करैत अछि, हुनका सोलह महादान, पृथ्वी दान आ समस्त तीर्थ दर्शनक फल प्राप्त होइत अछि। वैवाहिक जीवन मे सुख-समृद्धि लेल सेहो सीता नवमी अत्यंत महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि। एहि दिन माता सीता के श्रृंगारक समस्त सामग्री अर्पित कएल जाइत अछि आ सुहागिन महिलाएँ व्रत राखि अखंड सौभाग्यक कामना करैत छथि।
वास्तव मे साहित्य समाजक दर्पण मात्र नहि, बल्कि प्रेमचंदक शब्द मे समाज के राह देखेबाक मशाल सेहो अछि। ई बात केवल प्रगतिशील मूल्य लेल नहि, बल्कि परंपरागत मूल्य लेल सेहो समान रूप सँ सत्य अछि। सीता केर कथा भारत मे सबसँ अधिक सुनल, कहल आ मंचित होबय वाला कथा मे सँ एक अछि। भारतीय जनमानस के आकार देबाक आ स्त्रीक एक आदर्श छवि गढ़बाक मे एहि कथाक महत्वपूर्ण योगदान रहल अछि।
माता सीता एक ओर भारतीय आदर्श पत्नी छथि—जिनका भीतर पति-परायणता, त्याग, सेवा, शील आ सौजन्यक गुण विद्यमान अछि। दोसर ओर ओ एहन नारी छथि जे कठिन परिस्थिति मे सेहो आत्मसम्मान आ श्रमसाध्य जीवन मे गौरव अनुभव करैत छथि—
“औरों के हाथों यहाँ नहीं चलती हूँ,
अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ॥”
लोक-अपवादक कारणे सीता निर्वासित भेली, मुदा ओ अपन उदार हृदय आ सहिष्णु स्वभाव के कखनो नहि छोड़लनि। ओ श्रीराम पर दोष देबाक बजाय एहि के लोकोत्तर त्याग मानि स्वीकार कएलनि। भारतीय संस्कृति मे पति-पत्नी एक-दोसराक पूरक मानल जाइत छथि। एहि आदर्श के सर्वोत्तम उदाहरण जानकी जी छथि, जखन श्रीराम हुनका वन मे संग नहि लए जाए के सलाह दैत छथि, त ओ स्पष्ट शब्द मे कहैत छथि—
“प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं,
मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।
जिय बिन देह नदी बिनु बारी,
तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥”
जानकी नवमी पर विशेष
अशोक वाटिका मे रावण द्वारा अनेक उपाय सँ विचलित करबाक प्रयास कएल गेल, मुदा माता सीता अपन आदर्श पर अडिग रहली आ केवल श्रीराम के स्मरण करैत रहली—
“तृन धरि ओट कहति वैदेही,
सुमिरि अवधपति परम सनेही।
सुनु दस मुख खद्योत प्रकासा,
कबहुँ कि नलिनी करइ विकासा॥”
वाल्मीकि रामायण अनुसार, मिथिला मे एक बेर भयंकर अकाल पड़ल छल। तखन राजा जनक यज्ञ कएलनि आ स्वयं हल चलाबय लगलाह। ओही समय धरती सँ एक सोने के डलिया मे एक सुन्दर कन्या प्राप्त भेली। हुनका उठाबैतहि वर्षा शुरू भ’ गेल। राजा जनक ओहि कन्या के “सीता” नाम देलनि आ पुत्री रूप मे स्वीकार कएलनि।
भगवान श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम कहल जाइत अछि। आदर्श पति-पत्नी के उदाहरण आजो राम-सीता सँ देल जाइत अछि। माता सीता एक राजकुमारी रहितो अपन पति संग वनवास जाए के निर्णय लेलनि आ 14 वर्ष धरि कठिन जीवन जीबय लेल तैयार भेली। विकट परिस्थिति मे सेहो दुनू एक-दोसराक साथ नहि छोड़लनि। रावण द्वारा हरण भेला पर सेहो माता सीता अपन पवित्रता आ पतिव्रता धर्म के अक्षुण्ण रखलनि।
राम-सीता के संबंध आजो प्रत्येक दंपति लेल प्रेरणा स्रोत अछि—जतय प्रेम, विश्वास, त्याग आ कर्तव्य के अद्भुत संतुलन देखाइत अछि। जानकी नवमी केवल एक पर्व नहि, बल्कि भारतीय संस्कृति, नारी गरिमा आ आदर्श जीवन मूल्यों के स्मरण करबाक एक पावन अवसर अछि।