
सुभाष चन्द्र
महादेव शोणित सं नहायल रहैत छथि। हुनक जलधरि मे शोणित बहैत अछि। फूल बेलपत्र संग शोणित कें धार बहैत अछि।
ई सबटा सत्य अछि। कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। हम गप्प कय रहल छी डोकहर कें। मिथिला मे डोकहर नाम सं प्रसिद्ध अछि शिव आ शक्ति कें स्थान। मधुबनी जिला मुख्यालय सं करीब 7 किलोमीटर उतर।
एहि मंदिर कें गर्भ गृह मे लोकसभ अपन मनोकामना पूर्ति भेलाक बाद छागर कें बलि दैत छथि। शिव-पार्वती कें प्रतिमा कें सोझां। ओतय गर्भगृह के बीचों बीच शिवलिंग अछि। बलिप्रदान के समय जे शोणित कें धार बहैत अछि, ओ शिवलिंग पर सद्यः पडैत अछि। हुनक जलधरि सं फूल-बेलपत्र कें संगे संग ओ बहैत अछि। श्रद्धालु ओकरा अपन माथ सं लगबैत छथि। ई सबटा अनादिकाल सं होइत रहल अछि।
ओना आम सोच इएह अछि जे शिव कें स्थान पर बलिप्रदान नहि होइत अछि। मुदा डोकहर कें जहन गप्प करी त एहिठाम शिव आ शक्ति कें एक्के संगे वास करबाक कारणे ई संभव अछि। तंत्र के जानकार पंडित दयानंद झा कहैत छथि जे असल मे एहिठाम शिव पार्वती नहि वरन राज राजेश्वरी छथि। पूजा काल मे पार्वती कें नहि, वरन राज राजेश्वरी के आह्वान कएल जाइत अछि। ई सभटा हुनके प्रताप छन्हि। हिनक संबंध प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामाख्या सं अछि। ई स्थान सिद्ध अछि। एहिठाम शुरूए सं बलिप्रदान होइत रहल अछि आ सेहो गर्भगृह मे।

कहल जाइत अछि जे भगवती राजराजेश्वरी मूलप्रकृति शक्ति के ंसुंदर प्रौढावस्था स्वरूप श्री विग्रह वाली देवी छथि। उदय कालीन सूर्य सन हिनक कान्ति छन्हि। चतुर्भुजी, त्रिनेत्री, पाश, अंकुश, इक्षु व पद्म धारण कएने छथि। ई भगवती सहज आ शांत मुद्रा मे सृष्टि संचालक ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र आ इन्द्र रूपी चारि स्तभ कें उपर स्थित पंचमहाभूत कें संयुक्त स्वरूप शिवरूपी आधारपृष्ठ पर माया ‘ह’ कार कें मुद्रा मे विराजमान छथि। भगवती राजराजेश्वरी श्यामा आ अरूण वर्ण कें भेद सं दू टा कहल गेल छथि। श्यामा रूप मे हिनका श्री आनंदभैवरी कहल जाइत अछि आ दोसर अरूण वर्ण मे श्री राजराजेश्वरी कहाबैत छथि। ई शक्ति तीनू लोक मे समस्त सत्ता, शासन आदि राजसी ऐश्वर्य आदि सं परिपूर्ण छथि, ताहि ई राजराजेश्वरी, कमला महाराज्ञी व महासम्राज्ञी कहाबैत छथि। एहि सृष्टि कें सर्वोच्च अध्यात्म साधना विधान श्रीविद्या समूह कें अधीन तृतीय पुरूषार्थ काम कें कुल भेदक अनुसारे चारि अधिष्ठात्री मे स एक देवी छथि। अखिल ब्रह्माण्ड कें द्योतक श्रीचक्र मे हिनक निवास मानल गेल छन्हि।
डोकहर कें महादेव कें नाम कालेश्वरनाथ महादेव

डोकहर निवासी आ पंडित श्री गांधी जी कहैत छथि जे हम सभ शुरू सं एहिठाम बलिप्रदान होइत देखलौं। आइयो होइत अछि। गांधी जी कहैत छथि, जे डोकहर कें महादेव कें नाम कालेश्वरनाथ महादेव छन्हि। एहिठाम काल सेहो ठमकि जाइत अछि। महादेव कें एहिठाम शोणित जेना प्रिय होइन्हि। ताहिं, जहन राज राजेश्वरी कें प्रतिमा कें सोझा बलि देल जाइत अछि त ओकर पूरा शोणित महादेव पर पडैत छन्हि। शिवलिंग शोणितमय भ जाइत अछि।
जानकारी इहो भेटल जे समय-समय पर किछु लोक एहि गर्भगृह मे बलिप्रदान करबा कें विरोध कएलाह। विधि विधान सं कुमारि कें माध्यम सं उचारबाक कोशिश भेल। तीन बेर दू टा पर्ची पर लिखल गेल। मुदा हरबेर निष्कर्ष इएह निकलल जे बलिप्रदान हेबै टा करत आ सेहो गर्भगृह मे। ताहिं, ई चलि आबि रहल अछि।
बता दी जे राज-राजेश्वरी भगवती मधुबनी सअ उत्तर बहरवन बेलाही गांव के निर्जन स्थान मे बिन्दुसर पोखैर के कात माता राज-राजेश्वरी विराजइत छैथ। इ स्थान आदिशक्ति मातृदेवी पार्वती एवं शिव के रमणीय स्थली के रूप मे आदिकाल सअ अछि। दुख हरय वाली भगवती कें रूप मे प्रसिद्ध होबा कारणे बोलचाल मे एहिस्थान कें नाम डोकहर पडि गेल। मंदिर के पश्चिमोत्तर भाग मे प्राकृतिक बिंदुसर नामक सरोवर अछि। जाहि मे लाल कमल फूल खिलाइत अथ्छ। आदिशक्ति मातृ देवी पार्वती सदाशिव भोले नाथ के संगे एहिठाम सं कोनो श्रद्धालु कें निराश नहि जाय दैत छथिन्ह।

जानकार कहैत छथि जे मंदिर तिरहुत नागर शैली कें अछि, जे दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह(1850-60)द्वारा निर्मित कहल जाइत अछि। एहि सं पूर्व एकरा राजा राघव सिंह के बबुआन भाई नंद नंदन सिंह 1725 के आसपास बनोलाह। मंदिर परिसर में गौरी कुंड है अछि। आदि काल सं मिथिला भूमि मे पार्वती पूजन कें परंपरा रहल अछि। एहि शक्तिपीठ कें प्राचीनता के संग-संग वर्तमान गौरीशंकर कें युगलमूर्ति सेहो प्राचीन अछि। कहल जाइत अछि जे बुद्ध काल मे ब्राह्मण धर्म कें विरोध होमय पर देव विग्रह के बचेबाक लेल निकट कें चंद्रभागा नदी मे दय देल गेल रहय। जकरा बाद मे संक्रमण काल के समाप्त भेला पर दोबारा मंदिर बना कय स्थापित कय देल गेलैं। एहि शक्तिपीठ के मैथिली सीता व विदेह जनक द्वारा पूजित होबाक गप्प सेहो कहल गेल अछि।