आउ हमर जिनगी मे

कुमार मनीष अरविन्द

हवाक झोंक जेकाँ आउ हमर जिनगी मे।
आउ निधोख अहाँ आउ हमर जिनगी मे।।

बन्न कोठली / बिलैया हमर कल्पना
ठेलि द्वार अहाँ आउ हमर जिनगी मे।
मन-संसार बुझू जेठक दुपहरिया
पहिल फुहार जेकाँ आउ हमर जिनगी मे।
बबूर-काँट भरल बाट, हम हेरायल
सिंगरहार जेकाँ आउ हमर जिनगी मे।

इनार भुतहा गिडय़ ई अन्हरिया
इजोत आँखिक दÓ आउ हमर जिनगी मे।
जबदियाह बनल जिनगी ठमकि कÓ रूकल
सुरक फाँक लÓ कÓ आउ हमर जिनगी मे।
चिड़ैक पाँखि लÓ कÓ आउ हमर जिनगी मे
इजोत आँखि लÓ कÓ आउ हमर जिनगी मे।

पहिल फुहार जेकाँ आउ हमर जिनगी मे।
ठेलि कÓ द्वार अहाँ आउ हमर जिनगी मे।
हवाक झोंक सन-सनाइत हमर जिनगी मे
आउ निधोख गुनगुनाइत हमर जिनगी मे।
आउ भरि पोख दनदनाइत हमर जिनगी मे।

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