महिषीक उग्रतारा स्थानमे अनूठ परंपरा, विजयादशमीक साँझ केवल महिलाके होइत अछि दर्शन

 

महिषी (सहरसा)। बिहारक सहरसा जिलाक महिषी स्थित अति प्राचीन श्री उग्रतारा स्थानमे विजयादशमीक साँझ एकटा अनूठ परंपराक निर्वहन कयल जाइत अछि। एहि विशेष अवसर पर मंदिरक गर्भगृह सहित पूरा परिसरमे केवल महिलासभके प्रवेश आ दर्शनक अनुमति रहैत अछि, जखनकि पुरुष श्रद्धालुसभक प्रवेश पूर्णतः निषिद्ध रहैत अछि। सदियासँ चलि आबि रहल ई परंपरा महिषीक धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत आ ऐतिहासिक मान्यतासभसँ जुड़ल अछि।

नवरात्राक नौ दिन पुरुष करैत छथि पूजा, दशमीक साँझ महिलाके विशेष अधिकार

परंपराक अनुसार, नवरात्रामे कलश स्थापनासँ लऽ कऽ विजयादशमीक साँझ धरि मां उग्रताराक नियमित पूजा-अर्चना पुरुष श्रद्धालुए करैत छथि। एहि अवधि मे महिषी आ आसपासक गामक महिलासभ लेल मंदिरमे प्रवेश वर्जित रहैत अछि। मुदा विजयादशमीक साँझ ई व्यवस्था बदलि जाइत अछि। एहि समय मंदिरक द्वार केवल महिलासभ लेल खोलल जाइत अछि आ ओ सभ मां उग्रताराक दर्शन कऽ आशीर्वाद प्राप्त करैत छथि।

स्थानीय मान्यताक अनुसार, ई परंपरा मात्र पूजा-पद्धति तक सीमित नहि अछि, बल्कि एकर पाछाँ क्षेत्रक प्राचीन तंत्र साधना आ धार्मिक मान्यताक इतिहास जुड़ल अछि।

तंत्र साधनाक परंपरासँ जुड़ल अछि इतिहास

महिषी प्राचीन कालसँ तंत्र साधना आ तांत्रिकसभक साधना-स्थलीक रूपमे प्रसिद्ध रहल अछि। मानल जाइत अछि जे नवरात्राक समय दूर-दराजक क्षेत्रसँ साधक सभ एतय साधना करबाक लेल अबैत छलाह। हुनकर निवास श्री उग्रतारा स्थानक आसपास रहैत छलनि।

स्थानीय मान्यताक अनुसार, साधकसभक साधनामे कोनो प्रकारक व्यवधान नहि हो, एहि उद्देश्यसँ नवरात्राक नौ दिन धरि महिलासभक मंदिर प्रवेश पर रोक रहैत छल। कालांतरमे ई व्यवस्था धार्मिक परंपराक हिस्सा बनि गेल, जे आइयो कायम अछि।

रानी पद्मावतीक प्रयाससँ महिलासभक दर्शन शुरू होयबाक मान्यता

श्री उग्रतारा मंदिरक इतिहाससँ जुड़ल विवरणक अनुसार, 16म शताब्दीमे दरभंगा राजपरिवारक रानी पद्मावती वर्तमान मंदिरक जीर्णोद्धार करौने रहथि। रानी पद्मावती धार्मिक काजमे विशेष रुचि रखैत छलीह।

स्थानीय आख्यान आ उपलब्ध जानकारीक अनुसार, रानी पद्मावतीक विशेष प्रयाससँ दशमीक साँझ मां उग्रताराक मंदिरमे महिलासभक प्रवेश आ दर्शनक व्यवस्था शुरू भेल। हालांकि, एहि परंपराक प्रारंभसँ संबंधित ऐतिहासिक तथ्यक स्वतंत्र पुष्टि लेल बेसी शोधक आवश्यकता अछि।

बुजुर्ग महिलासभक अनुभवमे जीवंत अछि परंपरा

महिषीक पारंपरिक साधक परिवारसँ जुड़ल 90 वर्षीया वयोवृद्ध गोदावरी देवी एहि परंपराके अपन जीवनक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुभव मानैत छथि। ओ बतौलनि जे आजादीसँ पहिने विवाहक बाद जखन ओ महिषी अयलीह, तखन हुनकर सासु पहिल बेर विजयादशमीक साँझ हुनका मां उग्रताराक दर्शन करौने रहथिन।

महिषी निवासी 82 वर्षीया उषा चौधरी सेहो अपन अनुभव साझा करैत एहि विशेष परंपराक निरंतरताक पुष्टि कयलनि। वर्तमानमे नई दिल्लीमे रहैत उषा चौधरीक अनुसार, दशमीक साँझ महिलासभक दर्शनक ई व्यवस्था स्थानीय धार्मिक जीवनक महत्वपूर्ण हिस्सा रहल अछि।

बुजुर्ग महिलासभक अनुभव ई देखबैत अछि जे ई परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होइत आबि रहल आस्था आ सांस्कृतिक स्मृतिक हिस्सा सेहो अछि।

परंपराके ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भमे बुझबाक जरूरत : डॉ. अक्षय कुमार चौधरी

महिषी आ आसपासक क्षेत्रक सामाजिक तानाबानापर गंभीर शोध करयवला समाजशास्त्रक प्रोफेसर डॉ. अक्षय कुमार चौधरी एहि परंपराके ऐतिहासिक आ सामाजिक संदर्भमे बुझबाक जरूरत पर जोर देलनि। हुनकर कहब छनि जे एकरा सीधा महिलासभक संग भेदभावक रूपमे देखब उचित नहि होयत।

ओ कहलनि जे महिषीक मूल निवासीसभक कुलदेवी ज्वालामुखी मानल जाइत छथि, जिनकर पूजा केवल पुरुषसभ द्वारा कयल जाएबाक परंपरा बताओल जाइत अछि। डॉ. चौधरीक अनुसार, एहि तरहक धार्मिक व्यवस्थाके बुझबाक लेल ओहि समयक सामाजिक परिस्थिति, मान्यता आ परंपराक अध्ययन जरूरी अछि। ओ एहि विषयपर व्यवस्थित शोध करबाक आवश्यकता सेहो बतौलनि।

आस्था, इतिहास आ परंपराक अनूठ संगम

श्री उग्रतारा स्थानमे विजयादशमीक साँझ महिलासभके दर्शनक विशेष अनुमति महिषीक विशिष्ट धार्मिक परंपराके उजागर करैत अछि। नवरात्राक नौ दिन पुरुषसभ द्वारा पूजा-अर्चना आ अंतिम दिन महिलासभक दर्शनक ई व्यवस्था तंत्र साधना, स्थानीय मान्यता, ऐतिहासिक आख्यान आ पीढ़ीसँ चलि आबि रहल आस्थाक संगम प्रस्तुत करैत अछि।

एहि परंपराक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आ सामाजिक महत्वके बेहतर ढंगसँ बुझबाक लेल स्थानीय जनश्रुति संग प्रमाणिक ऐतिहासिक स्रोत आ समाजशास्त्रीय शोधक आधार पर अध्ययन कयल जाएब आवश्यक अछि।

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