हिमालयक कोख मे बसल देवगढ़: आधा आरतीक चमत्कार

हिमालयक उँच-नीच पहाड़क बीच, बादल सँ घेरायल एकटा सुन्दर गाम छल—देवगढ़। चारूकात देवदारक घनघोर जंगल, ठंढ हवा आ पहाड़ सँ झरैत झरना। गामक बीचोबीच लगभग चारि सए वर्ष पुरान Mahadev Temple, Devgarh स्थित छल। काला पत्थर सँ बनल ई मंदिर केदारनाथ शैलीक अद्भुत नमूना मानल जाइत छल। गर्भगृह मे स्वयंभू शिवलिंग स्थापित छल।

गामक बुजुर्ग कहैत छलाह जे पांडव अज्ञातवासक दौरान एतय एक राति शिवक तपस्या कएने छलाह। मंदिरक नियम अत्यन्त कठोर छल। साँझक आरतीक बाद कपाट बंद भऽ जाइत आ फेर भोर तक केओ मंदिरक दिस ताकबो नहि करैत।

मंदिरक पुजारी Shastri Ji कहैत छलाह—
“राति महादेवक गणसभक समय होइत अछि। मनुष्यक हस्तक्षेप वर्जित अछि।”

गौरा आ नंदूक संघर्ष

गामक अंतिम छोर पर एकटा टूटल-फूटल झोपड़ी मे Gaura अपन दस वर्षीय बेटा Nandu संग रहैत छलि। दू वर्ष पहिने नंदूक पिता जंगल गेलाह आ फेर कखनो लौटि नहि सकलाह।

गौरा दिनभर दूसरक खेत मे मेहनत करैत, गोबरक उपला बनबैत, तखन जाकऽ घर चलैत। मुदा एक मास सँ ओ गंभीर बुखार सँ पीड़ित छलि। खाँसी मे खून अबैत छल। वैद्य साफ कहि देने छलाह—
“शहर सँ दवा आनय पड़त। दू हजार रुपैया लागत।”

दू हजार! गौरा लेल ई सपना जेकाँ छल।

नंदूक एकमात्र सहारा छल—महादेव। रोज साँझ ओ मंदिर जाइत, आरती देखैत आ हाथ जोड़ि प्रार्थना करैत—
“बाबा, हमर माय केँ ठीक कऽ दिअ।”

ओह राति जखन आरती छुटि गेल

सावनक घनघोर वर्षा चलि रहल छल। ओहि दिन गौरा बेहोश भऽ गेलि। वैद्य कहलक—
“आइ राति दवा नहि भेटल तऽ भोर कठिन अछि।”

नंदू साहूकार लग दौड़ल। बहुत विनतीक बाद साहूकार 300 रुपैया देलक।

नंदू छह किलोमीटर पैदल शहर गेल, दवा किनलक आ वापसी मे उफनैत नदी तैरि कऽ पार केलक। जखन गाम पहुँचलक तऽ रातिक साढ़े आठ बजि चुकल छल।

मंदिरक कपाट बंद छल।

भीजल दवा हाथ मे लए सीढ़ी पर बैसल नंदू फफकि पड़ल—
“महादेव… आइ आरती नहि देखि सकलहुँ। माय लेल प्रार्थना सेहो नहि कऽ सकलहुँ। आब की हेतै?”

आधी रातिक घंटी

रातिक नौ बजला पर अचानक—

टन… टन… टन…

मंदिरक विशाल घंटी अपनहि बजए लागल।

पूरा गाम जागि उठल। लोक मशाल लऽ कऽ मंदिर लग जुटि गेल। ताला लागल छल, मुदा भीतर सँ घंटीक संग संस्कृत मंत्रक स्वर आबि रहल छल—

“नमः शिवाय… कर्पूरगौरं करुणावतारम्…”

Shastri Ji काँपैत स्वर मे कहलनि—
“ई असंभव अछि। चाबी तऽ हमर गला मे अछि!”

रहस्यमयी साधु

नंदू दरवाजाक एकटा दरार सँ भीतर ताकलक।

गर्भगृह उज्ज्वल प्रकाश सँ भरल छल। शिवलिंग पर ताजा बेलपत्र चढ़ल छल। सामने एकटा रहस्यमयी साधु ठाढ़ छलाह—संपूर्ण शरीर भस्म सँ ढँकल, लंबी जटा, गला मे रुद्राक्ष।

अचानक साधु आँखि खोललनि आ सीधा नंदूक दिश देखलनि।

ओ मुस्कुरेलाह आ कहलनि—

“भक्ति घड़ी देखिकऽ नहि अबैत अछि, बच्चा। महादेव भूख, गरीबी आ समय नहि देखैत छथि। ओ केवल भाव देखैत छथि।”

एतबा कहि ओ दीपक राखलनि—आ पलक झपकैत गायब।

चमत्कार

कपाट खोलल गेल। भीतर केओ नहि छल।

मात्र एकटा दीपक जरि रहल छल आ शिवलिंग लग पात मे बन्हल एकटा पुड़िया रखल छल।

Shastri Ji चौंकि उठलाह—
“ई तऽ महासंजीवनी अछि!”

नंदू दौड़ि घर गेल। दवा माय केँ पिलेलक।

आधा घंटा मे बुखार उतरि गेल। भोर होइत-होइत गौरा उठि बैस गेलि—
“नंदू, रोटी अछि?”

वैद्य नब्ज देखिकऽ स्तब्ध रहि गेलाह—
“ई दवा नहि, दुआक असर अछि।”

बदलि गेल देवगढ़

ओहि दिनक बाद गाम बदलि गेल।

  • मंदिर आब राति-दिन खुलल रहैत अछि।
  • साहूकार गौरा केँ बिछिया लौटा देलक।
  • प्रत्येक पूर्णिमा गरीबक लेल भंडारा होइत अछि—“अधूरी आरतीक भंडारा” नाम सँ।

आ नंदू?

आइ ओ 25 वर्षक छथि आ Mahadev Temple, Devgarh केर मुख्य पुजारी छथि।

ओ हर गरीब बच्चा केँ पहिने प्रसाद दैत छथि आ कहैत छथि—
“महादेव महल मे नहि, मजबूरक आँखि मे रहैत छथि।”


जीवनक पाँच पैघ सीख

1. बंद दरवाजा अंत नहि होइत अछि
जखन एकटा बाट बंद होइत अछि, दोसर खुलबाक तैयारी मे रहैत अछि।

2. भगवान मंत्र नहि, मन सुनैत छथि
सच्चा भाव सबसे पैघ पूजा अछि।

3. आधी रातिक घंटी जरूर बजैत अछि
सब सँ अन्हार समये आशाक शुरुआत होइत अछि।

4. मदद कोनो रूप मे आबि सकैत अछि
कखनो मित्र, कखनो अजनबी, कखनो चमत्कार।

5. अधूरी कोशिश सेहो स्वीकार अछि
नीयत शुद्ध हो तऽ अधूरी आरती सेहो पूर्ण मानल जाइत अछि।

आजुक मंत्र

जखन जीवन मे सब समाप्त लगय, आँखि मूँदि तीन बेर कहू—

“हे महादेव, जँ दरवाजा अहाँ बंद कएलहुँ अछि, तऽ खिड़की सेहो अहाँए खोलब। हमर विश्वास नहि टूटत।”

किएक तँ देवगढ़ जेकाँ, अहाँक जीवन मे सेहो आधी राति घंटी बजि सकैत अछि।

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