काशीक महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जखन चिताक राख हवामे घुलैत रहैत अछि, तखन सेहो हर संध्या एकटा दीया बिना तेलक जलैत रहैत छल।
ओहि दीया केँ जरबैत छल — भोला कुम्हार।
ई कथा अछि ओहि दीया आ ओहि अन्हारक बीच भेल युद्धक, जे बारह वर्ष सँ राखक नीचाँ साँस लैत रहल।
पहिल अध्याय : दुइ साधना
अस्सी घाटक पाछाँ भोला अपन हाथ सँ माटि सानैत छल। उम्र करीब पैंतीस वर्ष। हाथमे चाकक खरोंच, कंठमे केवल एक मंत्र — “नमः शिवाय।”
न वेद पढ़ने छल, न तंत्र जानैत छल। बचपनमे माएक अंतिम साँसक संग बस ई शब्द ओकर कानमे पड़ल छल।
ओ दीया बनबैत, घाट पर बेचैत, आ हर साँझ मणिकर्णिका घाटक ओहि शिला पर एकटा दीया राखि अबैत जतय कोनो अपन नहि जरबैत।
डोम पूछैत—
“भोला, तेल तँ नहि अछि?”
भोला मुस्की दैत कहैत—
“भक्ति तेल नहि माँगैत अछि, अपने जरैत अछि।”
दोसर दिस, श्मशानक उत्तर भागमे एकटा गुफा छल। ओतय बैसल छल रुद्रकेतु, जकरा लोक महाकाल तांत्रिक कहैत छल।
बारह वर्ष पहिने उज्जैन सँ आयल रुद्रकेतु पंचमकार साधना, शव-साधना आ अघोर सिद्धि प्राप्त क’ चुकल छल।
आब ओकर अंतिम इच्छा छल — शिवक तेसर नेत्रक अग्नि केँ यंत्रमे बाँधि लेब।
गुरु मरैत काल कहने छल—
“शिव मंत्र सँ नहि बँधैत छथि। केवल निष्काम भक्तक हृदय सँ खिंचैत छथि।”
बारह वर्ष धरि खोजि-खोजि रुद्रकेतु थाकि गेल छल।
एक अमावस्या राति ओ देखलक — भोला बिना तेलक दीया राखि लौटि रहल अछि, मुदा दीया जरि रहल अछि।
रुद्रकेतु मुस्कुरेलक—
“मिलि गेल।”
दोसर अध्याय : पहिल प्रहार
अमावस्याक राति।
श्मशानमे अघोर यज्ञ शुरू भेल।
आठ चिताक राख सँ मंडल, बीचमे नरमुंड, रक्त-चंदन, डाकिनीक आवाहन।
ओहि राति भोला घर लौटलक। पत्नी गंगा दू वर्ष पहिने ज्वरमे चलि गेल छल। छोटकी बेटी पार्वती सुतल छल।
आधी राति दरवाजा खटकल।
बाहर केओ नहि। केवल धुआँ।
धुआँ सँ एक स्त्री निकलल।
बिलकुल गंगा जकाँ।
“भोला, ठंढ लागि रहल अछि… भीतर ल’ चलू…”
भोला केर हृदय काँपि उठल।
मुदा अचानक ओ देखलक — स्त्रीक परछाई नहि छल, आ पाँव उल्टा छल।
भोला आँखि मूँदलक।
धीरे सँ कहल—
“नमः शिवाय।”
बस, एक शब्द।
धुआँ चीखैत राख बनि बिखरि गेल।
गुफामे बैसल रुद्रकेतु चौंकि उठल।
पहिल बेर ओकर मंत्र लौटि गेल छल।
तेसर अध्याय : लोभ, भय आ अहंकार
अगिला तीन मास धरि रुद्रकेतु भोला केँ तोड़बाक हर उपाय कएलक।
पहिने लोभ।
हर भोर भोला केर चाकक पास सोनाक मोहर भेटैत।
लोक कहैत—
“ले ल’, बेटीक भविष्य बनत।”
भोला मोहर उठा गंगामे बहा दैत—
“जे बिना तेल दीया जरबैत छथि, हुनका लेल सोनाक का मोल?”
फेर भय।
पार्वती राति-राति बुखारमे कहैत—
“बाबा, काला आदमी ठाढ़ अछि…”
भोला बस रुद्राक्ष फेरैत जप करैत।
भोर होइतहि बुखार उतरि जाइत।
फेर अहंकार।
काशीक पंडितसभ कहलक—
“तूँ सिद्ध पुरुष छी। प्रवचन दे।”
भोला सिर झुका देलक—
“हम त’ कुम्हार छी। बस नाम जानैत छी।”
रुद्रकेतु बुझि गेल — ई आदमी संसारक तीनू बंधन सँ परे अछि।
चौठ अध्याय : स्वप्न युद्ध
श्रावणक राति भोला सुतल।
स्वप्नमे अपने केँ मणिकर्णिका पर देखलक।
सामने रुद्रकेतु त्रिशूल गाड़ने बैसल छल।
ओ गरजल—
“तोहर नाम चाही। बदलामे शिवक दर्शन देब।”
भोला शांत स्वरमे कहल—
“नाम हमर नहि, हुनकर अछि। ल’ सकैत छी तँ ल’ लिय’।”
रुद्रकेतु मंत्र पढ़लक।
आकाश सँ पिशाच उतरल।
सर्प लिपटल।
चितासभ नाचय लगल।
भोला आँखि मूँदलक।
ओकर भीतर ओहि दीया जरि उठल।
बस एक जप—
“नमः शिवाय।”
अचानक डमरू बजल।
डम… डम… डम…
रुद्रकेतु काँपि उठल।
ओकर सभ मंत्र कटय लगल।
ओ अंतिम अस्त्र चलौलक—
“क्लीं काली महाकाल भैरवाय फट्।”
भोला बस कहल—
“शिवाय नमः।”
स्वप्न टूटि गेल।
रुद्रकेतु आसन सँ खसि पड़ल।
पाँचम अध्याय : महाशिवरात्रिक महासंग्राम
महाशिवरात्रि।
रुद्रकेतु अंतिम महायंत्र बनौलक।
बारह नरमुंड।
बारह दीप।
बीचमे रक्त सँ लिखल — भोला।
उद्देश्य छल — भक्तक नाम बाँधि शिव केँ खींचब।
आकाश काला पड़ि गेल।
चितासभ अपने भभकि उठल।
गाम डेराएल।
मंदिरक कपाट बंद।
भोला पार्वती केँ पड़ोसी लग छोड़लक।
एक लोटा जल लेने नंगे पाँव श्मशान पहुँचल।
रुद्रकेतु हँसल—
“आ गेल भिखारी? आब तोहर भगवान हमर वशमे होएत।”
भोला यंत्रक बाहर दीया राखलक।
वही बिना तेलक।
धीरे सँ कहल—
“बाबा, शिव बँधैत नहि छथि।”
रुद्रकेतु मंत्र पढ़लक।
डाकिनी, शाकिनी, वेताल प्रकट भेल।
श्मशान काँपि उठल।
भोला बस जप करैत रहल।
रुद्रकेतु:
“ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे!”
भोला:
“नमः शिवाय।”
रुद्रकेतु:
“ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं कालभैरवाय!”
भोला:
“शिवाय नमः।”
ध्वनि टकरायल।
तंत्र खींचैत छल।
भक्ति समर्पित करैत छल।
धीरे-धीरे यंत्रक अग्नि भोला सँ घूमि रुद्रकेतु दिश बढ़ि गेल।
रुद्रकेतु चीखलक—
“तूँ की छी?”
भोला आँखि खोललक—
“हम कुछो नहि। आहिंक हारक कारण सेहो ईहे अछि।”
क्षणभरमे यंत्र फटि गेल।
बारह दीप बुझि गेल।
आकाश सँ श्वेत प्रकाश उतरलक।
रुद्रकेतु पर नहि।
भोला केर दीया पर।
दीया सूर्य जकाँ चमकि उठल।
ओहि प्रकाशमे रुद्रकेतु देखलक —
शिव बाहर नहि छथि।
ओकर अपन अहंकारे अन्हार छल।
आ भोला केर भीतरक खालीपन — ओही शिव छल।
रुद्रकेतु घुटना पर गिरि पड़ल।
पहिल बेर हाथ जोड़लक—
“नमः शिवाय।”
अंतिम अध्याय : राखक दीया
भोर भेल।
तूफान नहि आयल।
लोक मणिकर्णिका पहुँचल।
देखलक — रुद्रकेतु भोला संग बैसि माटि सानैत अछि।
कोनो पूछलक—
“महाकाल, की करैत छी?”
रुद्रकेतु हँसि कहल—
“जे बारह वर्षमे नहि सीखलहुँ, से एक रातिमे सीखि लेलहुँ — बाँधब नहि, बनाबब।”
भोला ओकरा एकटा कच्चा दीया देलक।
रुद्रकेतु शिला पर राखलक।
भोला फुसफुसेलक—
“नमः शिवाय।”
दीया जरि उठल।
काशीक सीख
एखन धरि काशीमे कहल जाइत अछि—
तांत्रिक शक्ति संसार हिला सकैत अछि,
मुदा शिवभक्ति ओहि हिलेनिहार केँ सेहो शांत क’ सकैत अछि।
आ महाशिवरात्रिक राति, मणिकर्णिका घाटक ओहि शिला पर एखनहुँ एकटा दीया बिना तेलक जरैत अछि।
लोक पूछैत अछि—
“कोना?”
पार्वती, जे आब पैघ भ’ गेल अछि, मुस्की दैत कहैत अछि—
“जतय माँगब बंद भ’ जाइत अछि, ओतय जरब शुरू होइत अछि।”
